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Full text of "Jnj-aanaamrxta (varshh-39 Ank-11)"

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।. उज्जैन- 'धरा पर शान्ति' आध्यात्मिक महासम्मेलन का उद्घाटन करते हुए राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी जी, निरोगधाम के प्रधा 
ब्र.कु. मोहिनी बहन जी, बहन अनुराधा पौंडवाल जी, ब्र,कु, ओमप्रकाश भाई तथा अन्य | 2, आबू रोड ः 
का उद्घाटन करते हुए राजयोगिनी दादी प्रकाशमणि जी, राजयोगिनी दादी हृदयमोहिनी जी, ज़िलाधीश भ्राता सन्दीप 

बहन रीना बोस, ब्र.कु. भ्राता निर्वैर जी, ब्र.कु. डॉ. बनारसी भाई, २. आस, जीतथाअन्य। 








. मण्डी- हिमाचल प्रदेश के मुख्यमन्त्री भ्राता वीरभद्र सिंह, अन्तर्राष्ट्रीय शिवरात्रि मेले में विश्व-नवनिर्माण चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए। साथ 
में हैं सिंचाई मन्री भ्राता कौल सिंह ठाकुर, ब्र.कु. शीला तथा अन्य। 2. मुम्बई (विले पार्ले)- बिड़ला कम्पनी समूह की निदेशक बहन राजश्री बिड़ला 
को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. योगिनी। 3. मुम्बई (कुर्ला)- स्वास्थ्य मेले में लोकसभा अध्यक्ष भ्राता मनोहर जोशी को ईश्वरीय सन्देश देती हुई 
ब्र.कु, प्रमीला। 4. बारडोली- 'शिव ज्योति भवन' का उदघाटन करते हुए राजयोगिनी रत्नमोहिनी दादी जी, ब्र.कु. सरला बहन, ब्र.कु. मंजुला बहन, 
ब्र.कु. लता तथा अन्य। 5. बेलपाहार- उड़ीसा के मुख्यमन्त्री भ्राता नवीन पटनायक का स्वागत करती हुई ब्र.कु. कमला। 6. तिनसुकिया- केन्द्रीय 
सामाजिक न्याय तथा सशक्तिकरण राज्यमन्री डॉ. भ्राता संजय पासवान, ज्ञान-चर्चा के बाद ब्र.कु. सत्यवती तथा अन्य के साथ समूह चित्र में। 
7. देहली (नांगलोई)- समाज सेवा प्रभाग के कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए केन्द्रीय श्रम मन््री भ्राता साहिब सिंह वर्मा, ब्र.कु. सुन्दरी, ब्र.कु. देवकी 
बहन, ब्र.कु. सुरेन्द्र भाई तथा अन्य। 8. पटियाला- सरकारी स्वास्थ्य मेले में सम्पूर्ण स्वास्थ्य प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए पंजाब के मुख्यमन्त्री कैप्टन 
भ्राता अमरिन्द्र सिंह तथा सांसद बहन महारानी प्रणीत कौर। ब्र.कु. कमला, मेयर भ्राता विष्णु शर्मा तथा अन्य भी साथ में हैं। 


छांगय्‌ की कलम हो - 














पोगी के लिए निषम 








य॒ जे गी अपने जीवन को 
सतोप्रधान बनाने के लिए 
अथवा अपने मन की भूमिका को 
योगानुकूल बनाने के लिए आचरण- 
सम्बन्धी कुछ नियमों का पालन करता 
है। उनको पालन किये बिना 
योगाभ्यास में मनुष्यात्मा की न प्रगति 
हो सकती है, न ही उसे प्रभु-मिलन 
वे उद्देश्य में सफलता मिल 
सकती है। 
इन नियमों में से एक है 'प्रतिदिन 
ईश्वरीय ज्ञान का श्रवण, मनन अथवा 
अध्ययन। इसे ही कई लोग 
'स्वाध्याय” भी कहते हैं। ईश्वरीय 
ज्ञान ही घृत है जो कि योग रूपी दीपक 
को जगाये रखने के लिए जरूरी है। 
ज्ञान ही आत्मा के लिए स्नान है अथवा 
मन के लिए अंजन, अमृत, संजीवनी 
अथवा भोजन है। प्रतिदिन ईश्वरीय 
ज्ञान श्रवण किये बिना आत्मा में 
उत्साह और प्रभु-प्रेम की कमी होने 
लगती है और उसमें सैद्धान्तिक 
दुर्बलता, मानसिक कमज़ोरी, संशय, 
आत्मविश्वास की कमी, लोक-भय 
आदि उत्पन्न होने लगते हैं और 
चिरकाल तक इस नियम को छोड़ 
देने से मुनष्य की आध्यात्मिक मृत्यु 
होने की सम्भावना हो जाती है और 
वह नैतिक नियमों के पालन में 


लापरवाह होने लगता है। अतः: 
ईश्वरीय ज्ञान को, आत्मा के जन्म- 
जन्मान्तर के रोगों की औषधि अथवा 
दुर्बलता दूर करने वाला पौष्टिक तत्व 
मानकर सेवन करना चाहिए। 

एक अन्य अत्यन्त आवश्यक 
नियम है - गृहस्थ जीवन में कमल 
पुष्प-सम अलिप्त रहना। जो 
सपत्नीक जीवन व्यतीत करता है, 
वह भी काम कटारी द्वारा न अपना 
घात करे न अपनी युगल का। वह 
काम के कीचड़ से न स्वयं लथपथ 
हो न पत्नी को इस दलदल में धकेले। 
वह काम को कुढठाराघात 
((774 855४0४॥) माने। गीता 
में 'काम' को "नरक का द्वार' अथवा 
मनुष्य का “महावैरी' माना गया है 
जिसे ज्ञान रूपी तलवार से मारना ही 
योगी के लिए उचित कहा गया है। 
कामी मनुष्य तो भोगी होता है; जो 
योगी बनना चाहता है वह ब्रह्मचर्य 
ब्रत का पालन करके शक्ति का संचय 
करता है जिससे उसका मनोबल 
बढ़ता है। वह चमड़ी के आकर्षण से 
मुक्त होकर ईश्वर के आकर्षण से 
युक्त होता है। 'जहाँ काम है वहाँ 
राम नहीं”, इस उक्ति के अनुसार वह 
काम की गुलामी छोड़कर राम को 








.] नारों बनी कल्याणी (कविता) .. |। 


५ तोनि्याी। 0.0 55700. | 
गे को झलक (कविता) ..... ।4 
<. सांचित्र संत्रा समायार ,.......... !5 


_ सुखद आभास (फील गुड) ..... 9 
_) जीवन दर्पण (कविता) ......... 20 
() क्या जीवन धुएँ में उड़ाने... .... 2। 
() में आजाद हो गई है 
'..] परमात्म प्रत्यक्षता वर्ष (कविता) 26 
...] स्वर्णिम संस्कृति का विकास ... 27 
() समस्या है आगे बढ़ाने... ...... 29 
( आशीर्वाद की कीमत .......... 3] 
...) मुस्करा कर चल मुसाफिर ..... 32 





फार्म - 4 
नियम 8 के अन्तर्गत अपेक्षित पत्रिका का विवरण 
. प्रकाशन : ज्ञानामृत भवन, 
शान्तिवन,आबू रोड 
(राजस्थान)30750 
2. प्रकाशनावधि ; मासिक 
3, मुद्रक का नाम: ब्र.कु. आत्मप्रकाश 
क्या भारत का नागरिक है? हाँ 
पता उपरोक्त 
, प्रकाशक का नाम: ब्र.कु. आत्मप्रकाश 
क्या भारत का नागरिक है? हाँ 
उपरोक्त 
. सम्पादक का नाम: ब्र.कु. आत्मप्रकाश 
क्या भारत का नागरिक है? हाँ 
पता उपरोक्त 
सम्पूर्ण स्वामित्व: प्रजापिता ब्र.कु.ई.वि 
विद्यालय | मैं, ब्र.कु, आत्मप्रकाश, एतद्‌ द्वारा 
घोषित करता हूँ कि मेरी अधिकतम जानकारी 
एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण 


सही हैं। /#-/€ 
कि प्रकाश) 


सम्पादक 





पता 





सम्पादकीय, ४ म्फ ( द की य ++३६३+१३१+१००९१६०*१०० 


ञआा हार अपने आपमें एक 
आा औषधि है। यदि उसे सही 
तरीके से लिया जाए तो अन्य 
औषधियों की आवश्यकता बिल्कुल 
कम या नहीं के बराबर रह जाती है। 
इसके लिए आहार की मात्रा और श्रेणी 
दोनों ही अनुकूल होनी चाहिएँ। यह 
भी सत्य है कि इस संसार में भूख 
का कष्ट उठाने वालों की बजाए भूख 
से अधिक खाकर कष्ट उठाने वालों 
की संख्या ज्यादा है। भूख से कम 
भोजन मिलना एक समस्या है परन्तु 
भूख से अधिक भोज्य पदार्थों का भोग 
भी कोई कम समस्या नहीं है। कम 
खाने के बजाए अनावश्यक और 
अधिक खाने से रोगों को शीघ्र 
निमनत्रण मिलता है। 

कई लोग भोजन को ईश्वर की 
पूजा जितना सम्मान देते हैं और मन 
को मन्दिर मान कर विधिवत्‌ सेवन 
करते हैं। कई फिर आहार को भूसा 
और शरीर को बोरे की तरह समझते 
हैं और बोरे के मुँह तक उसे ऐसा 
दूँस-दूँस कर भर लेते हैं कि हवा 
को गुजरना भी दुश्वार हो जाए। आज 
के समय में बढ़ते रोगों का कारण 
आहार के प्रति व्यक्ति का उचित 
दृष्टिकोण न होना है। होना तो यह 


22; 


आहार ही औषधि हे 


चाहिए कि जीवन आगे और आहार 
पीछे परन्तु मानव ने आज इसे उलट 
दिया है। आहार को आगे और जीवन 
को पीछे कर दिया है। जीवन की 
अनेक आवश्यकताओं में से आहार 
भी एक आवश्यकता है परन्तु वह 
इस एक आवश्यकता की आड़ में, 
अज्ञानतावश, पूरे जीवन को आहार 
के नाम मानो गिरवी-सा रख देता 
है। आहार का बंधक बन जाता है। 
आहार शरीर की आवश्यकता 
है परन्तु जब मन भोज्य पदार्थों को 
देख कर चलायमान होता है तो शरीर 
रूपी रचना से मोह होने के कारण 
वह अपनी पसन्द उस पर थोपने की 
कोशिश करता है। परिणामस्वरूप 
शरीर रोगी हो जाता है। मन ऐसा 
क्यों करता है क्योंकि जीभ रूपी इन्‍्द्री 
द्वारा अल्पकाल का आनन्द लेना 
चाहता है। लेकिन विचार कीजिए, 
मन का आनन्द क्षण भर का और 
शरीर का नुकसान उम्र भर का। कई 
बार हम देखते हैं कि कोई-कोई 
मालिक अपने गुस्से को अपने वाहन 
पर उतारते हैं। या तो उसे पीटते हैं 
या तेज दौड़ाते हैं या गलत रास्ते से 
छलांग लगवाते हैं। इससे उन्हें लगता 
है कि उनका तनाव कम हो रहा है। 


तनाव कम तो नहीं होता है पर कम 
होने का भ्रम ज़रूर होता है। इसी 
प्रकार, मानव भी जब अकेलापन, 
उदासी, खालीपन, अहंकार, तनाव, 
दिखावा, मान-शान के वशीभूत होता 
है तो शरीर पर कोड़े और हथोड़े जैसी 
कड़ी मार करता है जिसका बाहर से 
रूप मीठा होता है। वह शरीर को 
अनावश्यक तेज़ मिर्च-मसाले वाला, 
तला हुआ, तीखा, राजसिक, 
तामसिक भोजन देकर खुशी मनाना 
चाहता है परन्तु बार-बार ऐसी तीखी 
चीज़ें खाकर आखिर यह कार बेकार 
होने लगती है। मन की हर बुरी वृत्ति 
शरीर के द्वारा ही बाहर प्रकट होती 
है। जैसे क्रोधी अपने शरीर को पीटता 
है। मोह वाला मुँह ढाँप कर बिना 
खाए-पिए सोता है, आँसू बहाता है। 


अहंकारी व्यक्ति दीवारों से सिर 


टकराता है। इस प्रकार इन मोटे 
विकारों के कारण वह शरीर को सीधी 
क्षति पहुँचाता है और छोटे विकारों 
से छद्म क्षति पहुँचाता है। छद्म 
विकार जैसे कि फैशन की चीज़ों 
का आकर्षण, स्वास्थ्य के लिए 
हानिकारक और भड़कीले कपड़ों, 
जूतों का आकर्षण, अनावश्यक और 
देहाभिमान में लाने वाली चीज़ों को 


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“9-४४ ४/४ै/७७७७०-----*- छ्ा/काः दा त्ः -+--*«७»३६)३४७७७ 


पढ़ने, देखने, प्रयोग करने का 
आकर्षण आदि-आदि। इनके कारण 
धीरे-धीरे कर्मेन्द्रियाँ शिथिलता की 
शिकार होती हैं, शारीरिक समस्याएँ 
बढ़ती हैं। जिस प्रकार से एकाग्रता 
की प्राप्ति के लिए मन और बुद्धि का 
एकमत होना जरूरी है उसी प्रकार 
अच्छे स्वास्थ्य के लिए मुख और 
पेट का एकमत होना भी ज़रूरी है। 
कई चीज़ें जिला स्वीकार करती है 
पर वे पेट के अनुकूल नहीं होती हैं। 
मन और बुद्धि में से बुद्धि की बात 
श्रेष्ठ मानी जाती है, इसी प्रकार, भोजन 
के सम्बन्ध में भी जिह्ना के स्वाद के 
बजाए, पाचन तन्त्र की स्थिति पर 
ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए। 
आत्मा शरीर पर सवार है। 
उड़ना आत्मा को है परन्तु वाहन 
जितना हल्का होता है, वाहक को 
उतनी ही अपने उद्देश्य में सफलता 
मिलती है। यदि शरीर रूपी वाहन 
पाचन की प्रक्रिया में उलझा हो, जो 
खाया है वह पच नहीं रहा हो, या 
आलस्य पैदा कर रहा हो तो आत्मा, 
जो सूक्ष्म वतन की ओर उड़ान भर 
रही थी, वाहन के पाचन तन्त्र के 
भारीपन से भारी होगी और स्थूल 
वायुमण्डल के घेरे में ही चक्कर लगा 
कर लौट आएगी। इसलिए 
योगाभ्यासी के लिए आवश्यक है कि 
वह शरीर रूपी वाहन को हल्का और 


ठीक रखे और इसके लिए सात्विक 
आहारी तथा अल्पाहारी बने। 

संसार में मानव, धन बढ़ने पर 
पदार्थों के संग्रह के लिए पात्र, बर्तन, 
गोदाम आदि बड़े बना सकता है परन्तु 
पेट का आकार बढ़ाया नहीं जा 
सकता | गरीब-अमीर की भोजन की 
मात्रा लगभग समान ही रहती है। 
अमीर आदमी और ही मानसिक 
व्यस्तता और कम शारीरिक मेहनत 
के कारण गरीब से कम भूख महसूस 
करता है। गरीब या अमीर दोनों की 
रोटी, कपड़ा, मकान की मूलभूत 
आवश्यकताएँ समान हैं इसलिए कहा 
जाता है कि पेट ज्यादा नहीं माँगता, 
पाव आटे से भर जाता है। इसलिए 
यह कहना सरासर गलत है कि पापी 
पेट के लिए पाप करना पड़ता है। 
पेट पापी नहीं है, पेट को पाप का 
भोजन हजम होता ही नहीं है और 
उसकी आवश्यकता इतनी है ही नहीं 
जो छीना-झपटी, मार-पीट, चोरी- 
सीनाज़ोरी करनी पड़े। यह सब 
मूर्खतापूर्ण विचार मन की कमजोरी 
और अज्ञान से उत्पन्न हैं। मन का 
दोष पेट पर डाल कर आज इन्सान 
पेट के नाम पर इतने घृणित कार्य 
कर रहा है कि देखने, सुनने वाले 
की रूह काँप उठे। इसलिए एकान्त 
में बैठ अपने से पूछो कि मेरे पेट की 
आवश्यकता कितनी है और मेंरे संग्रह 
की लालसा कितनी है। कहीं दोनों में 


कण और मण जितना अन्तर तो नहीं 
है। पेट को कण जितना चाहिए और 
मन की लालसा मण की है तो यह 
लालसा पहले चरित्र को बिगाड़ेगी 
और फिर अनावश्यक दूँसा जाएगा 
तो शरीर भी बिगड़ेगा। इसलिए शरीर 
से और स्वयं से सच्चे रहिए, मन को 
ईश्वर से जोड़िए, पाप से नाता तोड़िए, 
पुण्य जोड़िए और ज्ञान-योग के पंखों 
पर उड़िए। 

हिंसा किसी भी रूप में त्याज्य 
है। कमज़ोर और आसकत संकल्पों 
के कारण शरीर को भारी कर लेना, 
रोगी या कुरूप कर लेना यह भी एक 
प्रकार की हिंसा है। यह धीमा 
शरीराघात है। जब-मानव अपने प्रिय 
शरीर के साथ अन्याय कर सकता 
है तो दूसरों के साथ क्या न कर लेता 
होगा ? दूसरों को उसके द्वारा सुख 
मिलने की क्या गारंटी है? यह सही 
है कि 5 तत्वों की अति तमोप्रधान 
स्थिति से निर्मित यह शरीर पहले ही 
तार-तार है। हमारा मानसिक प्रबन्धन 
यदि इसके .प्रतिकूल जाता है तो 
कहावत लागू होगी कि एक करेला, 
दूसरा नीम चढ़ा। इसलिए सादगी, 
स्वच्छता, सात्तिविकता के साथ प्रसाद 
रूप में शरीर को भोजन देकर इसे 
दीर्घजीवी और रोगीजीत बनाइये। 


- ब्रकु. आत्मप्रकाश्‌ 


मना जसनभनक्‍ ५ भ ुणय०«ण मम किक भवन न कं न पका ०० + फम० ० परम ले२०* ० _ रमन मिल मी लिन पक कक कक गम 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


3 


पवित्र धन - 


>ज्यर) 


रमपिता परमात्मा शिव ने 

हम बच्चों को आने वाली 
घोर विपत्तियों एवं अन्य प्रकार के 
संकटों की विशेष जानकारी दी है 
और उनके आने से पहले अपने तन- 
मन-धन को सफल करने को कहा 
है। इसके आधार पर ही हम नव- 
विश्व में श्रेष्ठ एवं उच्च पद प्राप्त कर 
सकेंगे। ईश्वरीय विश्व विद्यालय की 
स्थापना के समय से ही ज्ञान सागर 
परमपिता परमात्मा ने हम बच्चों को 
समय की सूचना दे दी थी कि अणु- 
युद्ध, गृह-युद्ध तथा प्राकृतिक प्रकोपों 
का सामूहिक वार होने वाला है। विश्व 
में शान्ति के लिए, सभी राष्ट्रों ने 
मिलकर संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना 
की और उसके सहयोग से एक बेहतर 
विश्व के निर्माण का लक्ष्य रखा गया। 
बेहतर विश्व के निर्माण के लिए धन 
की आवश्यकता होती है इसलिए 
संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व-बैंक की 
स्थापना की। उसके द्वारा विभिन्‍न 
प्रकार की आपत्तियों एवं आधथिक 
संकट का विश्लेषण करके दुनिया 
के सभी देशों के विषय में एक रिपोर्ट 
बनवाई, उसमें भारत के विषय में 
लिखा है कि भारत के मुख्य 3। राज्यों 
में से 22 राज्य घोर विपत्तियों से अति 
प्रभावित होने वाले हैं। यहाँ की 55 


4 


लत आए इन न मब 


प्रतिशत भूमि सम्भावित भूकम्प 
(8७॥॥ (0४७८८) से प्रभावित है, 
8 प्रतिशत भूमि चक्रवातों से प्रभावित 
होने वाली है एवं 5 प्रतिशत भूमि 
बाढ़ से प्रभावित होने वाली है। शास्त्रों 
में माउण्ट आबू के बारे में यह मान्यता 
है कि नक्की लेक नख से खोदी गई 
है। परन्तु वैज्ञानिक दृष्टिकोण से 
भूगर्भशाख्तरियों की यह मान्यता है कि 
नकक्‍्की लेक का जो गड्ढा है जिसमें 
अब पानी भरा है वह एक बुझा हुआ 
ज्वालामुखी है, जिसमें से एक जमाने 
में गरम-गरम लावा आदि पृथ्वी के 
मध्यबिन्दु से निकल रहा था। इसी 
के कारण ही माउण्ट आबू के नजदीक 
घाटियाँ बनी हुई हैं। जब विश्व 
विद्यालय की माउण्ट आबू और आबू 
रोड स्थित चल-अचल सम्पत्ति का 
बीमा (]75078706) कराया जाता 
है तो माउण्ट आबू भूकम्प पीड़ित 
इलाका होने के कारण बीमा कम्पनी 
([75प्राध06 (:07]98॥9) 
अत्तिरिक्‍क्त अधिभार (फऋ%7५ 
$77०॥७2८) ग्रहण करती है। 
माउण्ट आबू का यह वैज्ञानिक तथ्य 
सबको याद रहे। इस प्रकार भारत 
का 68 प्रतिशत अर्थात्‌ 2/3 भूभाग 
घोर विपत्तियों की छाया में रहने वाला 
है। आगे विश्व बैंक ने यह भी लिखा 


एवं विश्व बेक 
। 4 है है है ६ *] ९ 


0५९ , ) 


कं] 


हे हा कु. रमेश शाह, गामदेवी (मुम्बई) 


है कि भारत की केन्द्र सरकार की 
आय का 2 प्रतिशत इन घोर 
विपत्तियों के कारण बरबाद होता है। 
उन्होंने यह भी बताया है कि गुजरात 
के भूकम्प के कारण लगभग 6,550 
लाख डालर के उत्पादन का नुकसान 
हुआ, उसके बाद उसके कारण से 
प्रतिवर्ष भारत की कुल आय का ] 
प्रतिशत नुकसान चलता आ रहा है। 
गुजरात राज्य को उसके कारण 2 .2 
बिलियन डालर का नुकसान हुआ। 

इस रिपोर्ट में यह भी बताया 
गया है कि सारे विश्व में जो भी मकान 
हैं, उनमें से अधिकतर भविष्य में आने 
वाले भूकम्प का सामना करने की 
स्थिति में नहीं हैं। भूकम्प के थोड़े 
भारी झटके लगे तो वे सभी ताश के 
पत्तों की तरह धराशायी हो जायेंगे। 
जैसे गुजरात के कच्छ प्रान्त में भूकम्प 
आया और अहमदाबाद के कई मकान 
गिर गये और सम्पत्ति के नुकसान के 
साथ जनहानि भी बहुत हुई । इसलिए 
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि 
नगरपालिकायें मकान के प्लॉन को 
स्वीकृति तब ही दें, जब वह प्लॉन 
भूकम्प के बड़े झटकों को सहन करने 
में सक्षम हो और बहु-मंजिले मकानों 
के सम्बन्ध में तो यह बात विशेष 
रूप से ध्यान में रखनी चाहिए। 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


-+--०७ (3 है (9:8७ ज्ान्ाकूता 


अमेरिका के न्यूयार्क शहर के वर्ल्ड 
ट्रेड सेन्टर के दो बहु-मंजिला भवनों 
के. साथ ]] सितम्बर 200 में 
आतंकवादियों ने विमान टकराये और 
दोनों भवन धराशायी हो गये, उनका 
भी वर्णन इस रिपोर्ट में किया गया है 
और कहा गया है कि मकान ऐसे बनाने 
चाहिएँ, जो आतंकवाद का सामना 
कर सकें। 

उन्होंने यह भी कहा है कि सभी 
देशों को ऐसी घोर विपत्तियों का 
सामना करने के लिए विशेष निधि 
(#४॥0) का निर्माण करना चाहिए 
ताकि बीमा कम्पनियाँ बीमा-धारकों 
के दावों ((!]थ॥5) का पैसा दे 
सकें। बीमा की विशेष किश्तें 
(एह्प्राक्षा०8 श6ायांप्रा7) इकट्ठी 
करने का उत्तरदायित्व सभी 
नगरपालिकाओं, राज्य सरकारों, 
केन्द्र सरकारों के ऊपर रखा जाना 
चाहिए। अगर यह उत्तरदायित्व अभी 
से नहीं निभाया गया तो समय पड़ने 
पर विश्व की बीमा कम्पनियां बीमा 
धारकों के दावों को चुक्‍्ता नहीं 
कर सकेंगी। 

उन्होंने यह भी लिखा है कि 
विकसित देशों में तो यह विशेष बीमा 
किश्तें इकट्ठी करने के प्रयत्न हो रहे 
हैं और वहाँ विशेष प्रकार का कर, 
आयकर एवं बिक्रीकर आदि के साथ 
लगाया गया है। विकसित देश तो 


एवं पिछड़े देशों ने ऐसा फण्ड इकट्ठा 
करने की योजना अभी तक भी नहीं 
बनाई है इसलिए ऐसे देशों को 
विकसित देशों के दान एवं आर्थिक 
सहायता पर निर्भर होना पड़ता है और 
निर्भर होना पड़ेगा। 

रिपोर्ट में यह भी लिखा है कि 
विकसित देशों के द्वारा जो भी 
सहायता दी जाती है, वह पीड़ित गरीब 
जनता को पूरी नहीं मिलती है। उसका 
अधिकांश भाग उन देशों के नेताओं, 
पहचान वालों, निकट सम्बन्धियों या 
भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के पास चला 
जाता है। इसलिए सहायता करने वाले 
देश सहायता करते समय बहुत 
विचार करते हैं। ऐसी बातों के कारण 
दिन प्रतिदिन विश्व में सहायता-के स्नोत 
घटते जा रहे हैं। 

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है 
कि सारे विश्व में ।965 से 980 के 
बीच ॥5 वर्षों के समय में, घोर 
विपत्तियों के कारण 2.9 बिलियन 
(एक बिलियन सौ अरब के बराबर) 
डालर का नुकसान हुआ था, फिर 
98 से 995 तक के 5 वर्षों में 
3.4 बिलियन डालर का नुकसान 
हुआ और फिर 996 से 200] तक 
के 6 वर्षो में 3.8 बिलियन डालर 
का नुकसान हुआ। उन्होंने लिखा है 
कि ऐसे संकटों का सामना करने के 
लिए सारे विश्व के देश जितने तैयार 





रिपोर्ट में कहा गया है कि सुरक्षा 
की दृष्टि से अधिकतर व्यक्ति पैसा 
बैंकों में ही जमा करते हैं और बैंक 
उस पैसे को उद्योगों आदि को ऋण 
के रूप में देते हैं। उद्योगपति उद्योगों 
का बीमा कराते हैं किन्तु ऐसे समय 
पर बीमा कम्पनियाँ भी बीमा के दावों 
का पैसा देने में समर्थ नहीं होंगी जिससे 
उद्योग, बैंकों से लिये हुए ऋण को 
वापस नहीं कर सकेंगे। फिर बैंक 
भी जमा-कर्त्ताओं को, धन वापस नहीं 
कर सकेंगे। जमा करने वालों के 
पासबुक के पन्नों में पैसा जमा किया 
हुआ होगा परन्तु उनके हाथों में पैसा 
नहीं आ सकेगा। यह है विश्व बैंक की 
रिपोर्ट। शिव बाबा भी कहते हैं कि 
अपने तन-मन-धन को सफल कर 
सफलतामूर्त बनो । अपने पास जमा 
किया हुआ धन ऐसे समय में कुछ 
भी काम नहीं आने वाला है। हम 
सबको ज्ञान सागर परमात्मा द्वारा दी 
गई श्रीमत और सावधानी परे अच्छी 
तरह विचार करना चाहिए और अपने 
पवित्र धन को सफल करबेद 
सफलतामूर्त बनना चाहिए। हम 
सबकी प्यारी मातेश्वरी जी हमें याद 
दिलाती थी - 

किसकी दबी रही धूल में, 
किसकी राजा खाये। 
किसकी जलाये आग, 
किसकी चोर लूट ले जाये। 


साधनसम्पन हैंकिन्तुविकाअशील हेनेचाहिएँ, उतनेनहींी।..... ४ 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


] 


चब्छण््वू हू सल्शकऊअजहु #ःब्यह”- 


यो (७० अल्‍कक- "करिल्सथा 
कक ह चर । 
< बह 63 


७०. दल. 


झा फैशन की दुनिया है। 
” चारों ओर फैशन ही 
फैशन दिखाई देता है। कपड़ों के, 
बालों के, गहनों के नित्य नए नमूनों 
से सारा बाजार गर्म है। आज मानव 
फैशन के पीछे अपना सारा धन तक 
लुटाने को तैयार हो जाता है। हम यूँ 
भी कह सकते हैं कि वह चमड़ी के 
पीछे दमड़ी भी खत्म कर लेता है। 
शाख्रों में धर्मगलानि की कई निशानियाँ 
बताई गई हैं उनमें से फैशन भी एक 
निशानी है। आज की नारी तो फैशन 
के पीछे जैसे शरीर को बेच देती है। 
अश्लीलता बढ़ती जा रही है। नारी 
एक शक्ति है, परमात्मा की श्रेष्ठ कृति 
है परन्तु फैशन के पीछे अपने जीवन 
को नष्ट कर रही है। नारी के प्रति 
दृष्टि, वृत्ति, कृति के विकृत होने का 
कारण भी यह फैशन ही है। सर्व 
विकार और उनमें से भी काम-वासना 
संसार में फैशन के कारण ही बढ़ती 
जा रही है। फैशन जीवन की 
आवश्यकता नहीं है। जीवन की 
आवश्यकता के लिए तो तीन शब्द 
कहे जाते हैं - रोटी, कपड़ा और 
मकान। हम भोजन खाते हैं जीने के 
लिए वस्र पहनते हैं शरीर को ढकने 
के लिए तथा गर्मी-सर्दी से बचने के 


- ब्र.कु.शीलू, आबू पर्व 


लिए और मकान में रहते हैं सुरक्षा 
के लिए। सरकार रोटी, कपड़ा, 
मकान के लिए बँधी हुई है, उन्हें महँगा 
नहीं कर सकती। इसी प्रकार, फैशन 
भी यदि आवश्यक होता तो वह सस्ता 
होता लेकिन हम देखते हैं कि फैशन 
की जितनी भी चीज़ें हैं वे सब बहुत 
महँगी हैं और कोई भी फैशन सदा 


नहीं चल सकता। आज कपड़े का. 


एक फैशन है, कल बदल कर दूसरा 
आ जाता है। तो कल वाला कपड़ा 
बेकार हो जाता है। तो यह 
परिवर्तनशील फैशन कितना धन, 
सम्पत्ति, समय, संकल्प और शक्ति 
यूँ ही गँवाता है। 

आज नारियाँ समझती हैं कि 
फैशन एक तंरीका है सुन्दर दिखाई 
देने का परन्तु इस प्रकार की सोच 
गलत है। कया इन्सान फैशन से ही 
सुन्दर लगता है ? कहावत है - सुन्दर 
वही है जो सुन्दर कार्य करता हे 
(प्क्चा08076 48 8 ॥900- 


: 8076 0068)। व्यक्ति के कर्म 


सुन्दर नहीं और केवल बाहर की 
सुन्दरता हो तो वह सच्ची सुन्दरता 
नहीं है। फैशन करने से मानव को 
अल्पकाल का आनन्द अवश्य 
मिलता है परन्तु बाद में इसी फैशन 


के कारण पारस्परिक स्पर्धा बढ़ती 
है। स्पर्धा के कारण कभी ईर्ष्या, कभी 
निराशा और कभी हताशा तथा 
उत्तेजना जैसे दूर्गुण पैदा होते हैं। फैशन 
से मनुष्य के चरित्र का पतन होता 
है। जितना हम सादे वस््र धारण करेंगे 
उतने ही विचार ऊँचे होंगे। बाहरी 
चकाचौंध में विचार घटिया होते जाते 
हैं। फैशन करते-करते व्यक्ति केवल 
अपनी देह को देखता है। 


५ 
घ्द्र बस वाक्ष बह का 


त्माक। 


गा शहना एसे हो 





जसे १ हक ॥ आंगार करना। 
श्र शरीर के पीछे धन, सम्पत्ति 
शक्ति बरबाद करना, मनुष्य के जीवन 
का लक्ष्य नहीं होना चाहिए। 
मनुष्य जीवन का लक्ष्य तो 
आत्मा की सुन्दरता को प्रकट करना 
है। शान्ति, प्रेम, सुख, आनन्द, दया, 
सहानुभूति, अन्तर्मुखता, धैर्य, 
गम्भीरता, मधुरता, सहनशीलता, 
समाने की शक्ति, सहन करने की 
शक्ति, सहयोग की शक्ति आदि ये 
सभी आत्मा को सजाने वाले गहने 
हैं। जब तक ये गहने स्वयं में धारण 
नहीं किए तब तक शरीर का श्रृंगार 
व्यर्थ है। जैसे एक छोटा बच्चा होता 
है। उसके अन्दर कितनी पवित्रता है ! 
उस पवित्रता के कारण वह प्यारा 
लगता है, चाहे वह बाहर से इतना 
सुन्दर न भी हो, पर उसकी पवित्रता 
बहुत आकर्षित करती है। इसी प्रकार, 
हम भी सादगी से रहें तो बहुत लाभ 





6 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 





होगा। हम समय और सम्पत्ति की 
बचत कर सकेंगे। इस बचत को सेवा 
में लगा सकेंगे जिसके लिए कहा गया 
है कि "कर भला तो हो भला ।” केवल 
अपनी सेवा में ही अपने श्वास, 
संकल्प, शक्ति लगाना सेवा नहीं है, 
इससे अल्पकाल का सुख तो मिल 
जाएगा लेकिन सदा काल का सुख 
नहीं मिल सकता क्योंकि किसी की 
दुआएँ तो प्राप्त की नहीं । 
फैशन के कारण देह-अभिमानी 
बना मनुष्य यह भी नहीं सोचता कि 
इस समय मेरा शरीर छूट जाए तो मैं 
क्या साथ ले जाऊँगा। क्या ये फैशन 
और गहने-वस्र मेरे साथ चलेंगे। 
बिल्कुल नहीं। अन्तिम समय जब 
इतनी चीज़ें पीछे छूटेंगी तो श्वास भी 
उनमें अटक जाएगा। परमात्मा की 
याद तो आएगी ही नहीं। परमात्मा 
की याद उसे ही आएगी जिसने 
परमात्मा को सच्चा साथी बनाया 
होगा। फैशन के पीछे पड़ने से हमारा 
यह जन्म तो व्यर्थ जाएगा ही, आगे 
के अनेक जन्म भी व्यर्थ जा सकते 
हैं। सादगी आत्मा का सच्चा श्रृंगार 
है। जितनी बाहरी सादगी होगी उतना 
हम आत्मा की सुन्दरता का अनुभव 
अधिक करते जायेंगे। तो क्‍यों नहीं 
हम सादगी अपनाएँ। चाहे कर्म कितने 
भी साधारण क्यों न हों, ऊँचे विचारों 
- से कर्म भी ऊँचे बन जाते हैं और 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


व्यक्तित्व भी ऊँचा बन जाता है। 
सुन्दरता का भी एक अपना समय 
होता है। जवानी में तो व्यक्ति सुन्दर 
होता ही है और बुढ़ापा आने पर 
सुन्दरता खत्म होती है। लेकिन बुढ़ापे 
में भी यदि वह अनेक दिव्य गुणों से 
सुसज्जित हो, तो उसकी सुन्दरता बनी 
रह सकती है। अन्य लोग उसके 


ब//57/ दूः ड़ 2०) (छ)& 


हैं। हम अपने आप से पूछें कि हम 
जीवन में क्या चाहते हैं ? क्या केवल 
जूते, कपड़े, जेवर, मोटर, गाडियाँ ? 
क्या यही चाहते हैं? यह सब 
विलासिता है। आत्मा की सच्ची 
आवश्यकता है - दिव्य गुण, 
शक्तियाँ, सत्य ईश्वरीय ज्ञान तथा 
राजयोग का अभ्यास, इससे ही जीवन 


अनुभवों से बहुत कुछ सीख सकते सफल होगा। 


५८. 
+५+ ९५१ 


योगी के लिए नियम...... पृष्ठ 0 का शेष 


अपने मन रूपी तख्त पर बिठाता है। ऐसे ही वह क्रोध, लोभ, मोह, 
अहंकार, आलस्य, निन्दा-स्तुति आदि से भी ऊँचा उठकर कमल-सम 
जीवन व्यतीत करने की कला का प्रयोग करता है। 

योगाभ्यासी अशुद्ध आहार को भी छोड़ देता है। वह सात्त्विक, 
आहार और अल्पाहार करता है। वह पवित्र कमाई करता है और पवित्र 
एवं योग-युकत व्यक्ति ही के हाथों द्वारा प्रभु की स्मृति में बनाये गये 
भोजन को, प्रभु को अर्पित करके प्रसादवत्‌ सेवन करता है। कहावत है 
कि “मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा उसका मन हो जाता है।' इसके 
अनुसार योगाभ्यासी शुद्ध अन्न का ही सेवन करता है ताकि उसका मन 
उसके पुरुषार्थ में विक्षेप उत्पन्न न करे। जैसे हंस क्षीर ले लेता है और 
नीर छोड़ देता है अथवा मोती चुग लेता है और कंकड़ छोड़ देता है वैसे 
ही योगी भी गुण ग्रहण करता है और अवगुण का परित्याग करता है। 

परन्तु योगी में सभी सदगुण तभी पनप सकते हैं जब वह स्वयं को 
देह से भिन्‍न एक “आत्मा” निश्चय करे और अपनी युगल को भी 
“आत्मिक' दृष्टि से देखे तथा अन्य सभी को आत्मिक नाते से भाई-भाई 
जाने। याद रहे कि आत्मा-निश्चय ही उन्नति की सीढ़ी है और देह- 
अभिमान ही पतन की जड़ है। जैसी स्मृति, वैसी ही वृष्टि और वृत्ति 
होती है। अत: “मैं एक ज्योतिस्वरूप आत्मा हूँ” ... इस स्मृति में स्थित 
होने से मनुष्य की दृष्टि और वृत्ति भी पवित्र एवं आत्मिक होती हैं। [तु 





“पत्र सम्पादक के नाम 


९०४ 
डे ल्‍्ा 


१8 
& 


मैं बहुत खुशी से यह पत्र लिख 
रह हूँ। मैं लंदन में रहता हूँ। मुझे 
पढ़ने का बहुत शौक है। मैंने बहुत 
किताबें, पत्रिकाएँ, धर्मशाखत्र, गीता, 
महाभारत आदि पढ़े हैं लेकिन आज 
तक मुझे न सच्चा ज्ञान मिला, न सच्ची 
शान्ति मिली, न सच्ची मंजिल मिली। 
मन भटकता ही रहा। पढ़ते-पढ़ते थक 
गया। आखिर वही हुआ जो कल्प 
पहले हुआ था। एक दिन मुझे 'ज्ञानामृत' 
पढ़ने को मिली। मैंने बहुत प्यार से, 
एक ही साथ, आदि से अंत तक सभी 
लेख एक ही श्वास में पढ़ लिए। पढ़ते 
ही मन नाचने लगा, खुशी से भरपूर हो 
गया। मन से आवाज निकली, मिल 
गया, मिल गया, जो ढूँढ़ रहा था, वो 
मिल गया। दिल बार-बार ज्ञानामृत 
पढ़ने के लिए प्रेरणा देता रहा। बस 
पढ़ता ही रहूँ। 

आज मैं बहुत खुशी से, अनुभव 
से लिखता हूँ कि पिछले एक वर्ष से 
'ज्ञानामृत' पढ़ते-पढ़ते मेरा जीवन बदल 
गया। मुझे सच्ची शान्ति, सच्चा ज्ञान, 
सच्ची मंजिल मिल गई | ज्ञानामृत विश्व 
का एकमात्र और प्रथम मासिक है जो 
अशक्त को सशक्त करने की अद्भुत 
और दिव्य शक्ति रखता है। जो जीवन 
परिवर्तन कर देता है तथा मानव को 


8 


(६ //5॥ 


देवता-तुल्य बना सकता है। ज्ञानामृत 
पढ़ते-पढ़ते मैं ज्ञान-स्वरूप आत्मा बन 
गई। अब आत्मा, परमात्मा, सृष्टि- 
चक्र तथा दिव्य परिवर्तन का सही ज्ञान 
और परिचय मिलने से मेरा पूरा परिवार 
अतीन्द्रिय सुख के झूले में झूल रहा 
है। जादुई शक्ति है ज्ञानामृत में। 
पारसमणि है ज्ञानामृत | मेरा और मेरे 
परिवार का जीवन धन्य, धन्य हो गया। 

ज्ञानामृत में हर लेख अनुभवयुक्त 
और शक्ति से भरपूर, दिल को स्पर्श 
करने वाला, उमंग-उत्साह भरने वाला 
होता है। यदि आपको शक्ति का अनुभव 
करना है तो बार-बार दिल से ज्ञानामृत 
पढ़ लीजिए, आपको अदभुत और दिव्य 
शक्ति का अनुभव स्वत: होगा और 
हीरे-तुल्य जीवन बन जायेगा। यह 
स्वानुभव है। सौ प्रतिशत विश्वास के 
साथ निश्चय है कि जीवन जीने की 
कला ज्ञानामृत पढ़ने से साकार होती 
है। धन्य हो गया मेरा जीवन, भाग्य 
बन गया मेरा मैं ज्ञानामृत के सम्पादक, 
सभी लेख लिखने वाले भाई-बहनों को 
कोटि-कोटि धन्यवाद देता हूँ और 
आभारी हूँ। 

ज्ञानामृत सारे विश्व में नया युग 
शीघ्र ही लायेगा। ज्ञानामृत प्रतिदिन सारे 
विश्व में हर आत्मा के पास पहुँचे। 


यही मेरी शुभेच्छा है। 
- अश्विन आर. पटेल, लंदन 
<><><><><><><><><><><><> 
ज्ञानामृत का फरवरी 04 का 
अंक पढ़ कर मन को असीम शान्ति 
का अनुभव हुआ। इतने भावपूर्ण इसके 
आलेख जीवन में नई चेतना की ऊर्जा 
भरते हैं। इससे जीवन के लिए 
आवश्यक अमृत का पान मैं कर सका। 
पत्रिका में आपका चमत्कारी संपादन 
कौशल स्पष्ट झलकता है। पत्रिका के 
माध्यम से आपका सदकार्य हमेशा जारी 
रहे, हमारी ऐसी ही मंगल कामना है। 
- शब्बन खान 'गुल', बहराइच 
<><><><><><><<><><><><> 
'ज्ञानएमूत्‌” जिसने पढ़ा, 
उसके खुल गए नैन। 
ज्ञान सत्य स्पष्टला, 
मधुर सुहावन बैन्‌।/ 
मधुर सुहावन बैन, 
सर्भी के मन्‌ को भावे। 
ब्च्चे-ड्ूढ़ो सभी, 
इसे पढ़ने को आते।। 
पढ़कर हुआ सुध्पर, 
व्यसन मगाय[ / 
स्मूति में एक बसा, 
मेरा शिव बाबत आया[।/ 
अदभुत ज्ञान रहस्य, 
समझ लो व्चनामूत्‌/ 
बनना जविन दिव्य, 
पढ़ें सब ज्ञानामूत्‌ । / 


रामनरेश आर्य, पत्रकार, भिठाई 
है है हे 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


मृत्यु पर दुःख क्यो? 


-# 


जा म और मृत्यु ये दोनों एक 

ही सिक्के के दो पहलू हैं। 
आत्मा कभी मरती नहीं है। शरीर के 
पाँच तत्व मृत्यु के बाद पाँच तत्वों में 
मिल जाते हैं। मृत्यु अर्थात्‌ आत्मा 
अपनी ड्रेस (चोला) और एड्रेस 
(पत्ता) को बदलती है। एक स्थान 
और शरीर रूपी वस्र को छोड़, दूसरे 
स्थान पर नया वस्त्र धारण करती है। 
इस शरीर रूपी मकान के भले ही 
हम कितने भी पुराने किरायेदार हों 
परन्तु एक दिन तो यह मकान खाली 
करना ही पड़ता है। यहाँ फिर इस 
दुनिया का यह कायदा नहीं चलता है 
कि पुराने किरायेदार से मकान खाली 
नहीं करा सकते हैं। मृत्यु एक अद्भुत 
घटना है जिसमें आत्मा जीवन के कर्म, 
संस्कार आदि को साथ ले जाती है। 
इसलिए मृत्यु को चिरनिद्रा भी कहा 
जाता है। मृत्यु अनेक रीति से आती 
है। कोई-कोई व्यक्ति बहुत दु:खी 
होकर मरते हैं, कोई हृदयाघात में 
अचानक ही मर जाते हैं। कोई यात्रा 
के दौरान मरते हैं, कोई को तो फाँसी 
से लटक कर मरना पड़ता है। इन 
सभी के पीछे उनके कर्म ही जवाबदार 
होते हैं। कोई विरले मनुष्य ही होते हैं 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


- ब्र.कु.ऊषा, आबू पर्वत 


जो प्रभु-स्मरण करते या सत्संग 
करते-करते शरीर छोड़ते हैं। कहा 
जाता है “अंत मति सो गति'। अंत 
समय मनुष्य की बुद्धि में जिसकी याद 
होती है, उस अनुसार उसकी गति 
होती है। इसलिए जब कोई मनुष्य 
मृत्यु के समीप होता है तब उसके 
पास गीता पढ़ी जाती है, भजन गाये 
जाते हैं, उसे ईश्वर की याद दिलाई 
जाती है। मानव के जन्म के साथ ही 
उसकी मृत्यु की तिथि, स्थल सब 
निश्चित होता है। जिस प्रकार फल 
जब पक जाता है तो वह स्वयं ही 
जमीन पर गिर जाता है, लेकिन ज़मीन 
पर गिरने पर उसके बीज से एक नये 
वृक्ष की शुरूआत होती है, इसी प्रकार, 
मृत्यु भी जीवन का अन्त नहीं है 


लेकिन नये जीवन का प्रवेश-द्वार है। 
जीवन क्रिकेट के खेल की तरह है। 
अनिश्चित है। क्रिकेट के खेल में 
बल्लेबाज को पता नहीं होता कि 
कौन-सी गेंद आडिरी गेंद है। वैसे ही 





मनुष्य को पता नहीं होता कि कौन- 
सा श्वास आखिरी श्वास है। ज्ञानी 
पुरुष मृत्यु के अस्तित्व को स्वीकारते 
नहीं और कहते हैं कि परिवर्तनशील 
विश्व में किसी चीज़ का नाश नहीं 
होता। भक्त कहते हैं कि मृत्यु तो 
मंगलमई घटना है क्योंकि भगवान के 
घर से बुलावा आया है। कर्मयोगी 
कहते हैं - मृत्यु अर्थात्‌ जीवन रूपी 
व्यापार का हिसाब देने भगवान के 
घर जाना। 

मृत्यु में मनुष्य मरते हैं परन्तु 
मृत्यु के भय से भी बहुत मनुष्य मरते 
हैं। एक गाँव में प्लेग का रोग फैला 
हुआ था। प्लेग से जितने मनुष्य मरे 
उससे अधिक लोग मृत्यु के भय से 
मर गए। प्रश्न उठता है कि मृत्यु 


9 





भयभीत क्यों करती है ? इसके अनेक 
कारण हैं जैसे कि - 

. मनुष्य को मृत्यु के सम्बन्ध 
में किसी प्रकार का ज्ञान नहीं है 
इसलिए भय लगता है, 2. घर से, 
माल-मिलकियत से लगाव होता है 
और उसे छोड़ने का दु:ख होता है, 
3. जिन सम्बन्धियों के साथ जीवन 
व्यतीत किया, उनका मोह खींचता 
है, 4. जीवन में किये हुए पाप कर्मों 
का साक्षात्कार और उनकी सज़ा का 
भय होता है। जिस प्रकार दिन भर 
किये कर्म रात को स्व के रूप में 
सामने आते हैं, वैसे ही, जीवन भर 
किये हुए कर्म मृत्यु के समय एक 
फिल्म के समान दिखाई देने लगते 
हैं। 5. भविष्य की चिन्ता लगती है 
कि पता नहीं अब हमारा जन्म कहाँ 
होगा, किस स्थिति में होगा आदि- 
आदि, 6. अकेलेपन का भय। 

जब शरीर बना तो वह शुद्ध 
स्वरूप में था परन्तु जीवन काल में 
मानव द्वारा शरीर से बहुत पाप होते 
हैं, इस कारण शरीर के तत्व अशुद्ध 
हो जाते हैं। मृत्यु के समय जब वह 
शरीर प्रकृति को अर्पित किया जाता 
है तो एक-एक तत्व की शुद्धि के 
लिए एक-एक विधि अपनाई जाती 
है। जैसे मृत शरीर के मुख में गंगाजल 
डालने से जल तत्व का शुद्धिकरण, 
घी के प्रयोग से अग्नि तत्व का 


0 


शुद्धिकरण, चंदन के द्वारा वायु का 
शुद्धिकरण, तुलसी के द्वारा आकाश 
तत्व का शुद्धिकरण और बची हुई 
राख को गंगा आदि में प्रवाहित करने 
से भूमि तत्व का शुद्धिकरण माना 
जाता है। 

मृत्यु के पीछे दु:खी होकर रोते 
रहने से दिवंगत आत्मा को बहुत दु:ख 
होता है। वह सूक्ष्म रूप में यह सब 
देखती है। इस पर एक कहानी याद 
आती है कि एक बार एक छोटी 
लड़की थी। उसकी माँ अचानक मर 
गई। लड़की का माँ से बहुत लगाव 
था इस कारण वह दिन-रात माँ को 
याद करके रोती रहती थी। एक दिन 
उस लड़की ने सपने में, गई हुई 
आत्माओं को सूक्ष्म शरीर में देखा। 
उनके बीच उसकी माँ भी थी जिसने 
सिर पर काले पानी से भरा एक बड़ा 
घड़ा उठाया था और वह बहुत उदास 
और दु:खी लग रही थी। यह देख 
लड़की को और अधिक दुःख हुआ 
और वह अधिक रोई। दूसरे दिन सपने 
में उसने फिर से उस समूह को देखा 
और पाया कि आज माँ के सिर पर 
काले पानी के दो बड़े घड़े थे। लड़की 
ने हिम्मत करके माँ से पूछा - “माँ, 
तुम इतनी उदास क्यों हो और तुमने 
सिर पर यह क्या उठाया हुआ है। 
कल एक घड़ा था, आज दो घड़े कैसे 
हैं?”” माँ ने अपनी लड़की से कहा - 





“मेरी उदासी का कारण तुम्हारा दु:ख 
है और इन दो घड़ो में तेरे आँसू भरे 
हैं। बेटी, तुम रोना बंद करो नहीं तो 
मुझे ज्यादा तकलीफ भोगनी पड़ेगी ।”' 
यह सुन कर लड़की ने तुरन्त रोना 
बंद कर दिया। 

यदि जाने वाली आत्मा के लिए 
सब मिल कर शान्त और स्वस्थ मन 
से परमात्मा को याद करें तो उसको 
शान्ति का दान मिलता है। यह सत्संग 
कुछ दिनों तक घर में चलता रहना 
चाहिए। गई हुई आत्मा की अन्तिम 
इच्छा का अगर ज्ञान हो तो उसे पूर्ण 
करना चाहिए मृत्यु एक हकीकत है 
जिसका सामना हम सभी को कभी- 
न-कभी अवश्य करना है। इसलिए 
मृत्यु को सहज बनाने की तैयारी हम 
अभी से करें | कोई-कोई वृद्धजन मृत्यु 
के समय पहनने वाले कपड़ों की 
तैयारी करके रखते हैं। क्या कपड़ों 
की तैयारी ही काफी है? बिल्कुल 
नहीं। जितना हो सके श्रेष्ठ कर्मों और 
श्रेष्ठ संस्कारों का पेटी-बिस्तर तैयार 
करना चाहिए। बच्चा जब जन्म लेता 
है तब उसकी मुट्ठी बंद होती है। वह 
पिछले जन्म के कर्मों की प्रालब्ध गुप्त 
रूप में साथ लेकर आता है। परन्तु 
मनुष्य मरता है तब उसके दोनों हाथ 
खुले होते हैं। वह इस स्थूल जगत 
की कोई भी वस्तु, साधन, सामग्री, 
व्यक्ति साथ नहीं ले जाता है। इसलिए, 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


_*---*७७६/९/७/७७०------०#- 


सिकन्दर ने अपने लोगों से कहा था 
कि जब में मरूँ तो मेरे दोनों हाथ 
बाहर रखना ताकि लोग यह देखें कि 
सिकन्दर इतने बड़े साम्राज्य का 
सम्राट था परन्तु जब गया तो हाथ 
खाली थे। अकेले आए, अकेले जाना 
है। साथ में सिर्फ श्रेष्ठ संस्कार ही 
जाते हैं। इसलिए जीवन के प्रत्येक 
क्षण को, श्वास को हमें सफल 
करना है। 
एत््ण के जाल 


॥ जॉली है? 


मृत्यु के बाद मनुष्यात्मा मनुष्य 


योनि में ही जन्म लेती है, कभी भी 
पशु योनि में जन्म नहीं लेती है। अपने 
पाप कर्म या पुण्य कर्म के हिसाब से 
वह दुःखी या सुखी परिवार में जन्म 
लेती है। कोई के कर्म इतने बुरे होते 
हैं जो भिखारी या चोर-डकैत के घर 
भी जन्म मिलता है। 

प्रश्न उठता है कि क्या मानव 
मृत्यु पर विजय प्राप्त कर सकता 
है? जवाब है - हाँ। मृत्यु टाली नहीं 
जा सकती पर उस पर विजय ज़रूर 
प्राप्त कर सकते हैं। विज्ञान ने प्रगति 
बहुत की है, उससे जीवन को कुछ 
वर्ष बढ़ाया जा सकता है परन्तु मृत्यु 
को टाला नहीं जा सकता। मृत्युजीत 
बनने में कालों के काल, महाकाल 
परमात्मा अमरनाथ ही हमारी मदद 


कर सकते हैं। इसके लिए राजयोग 
श्रेष्ठ साधन है। राजयोग अर्थात्‌ शरीर 
के भान से स्वयं को अलग आत्मा 
निश्चय करना है और जीते जी मरने 
का अभ्यास करना है। भगवान की 


5४ ००७७ ै&७७०-----०- 


याद में रह, कर्मयागी बन, श्रेष्ठ कर्मो 
की पूँजी के द्वारा हम मृत्युंजय बन 
सकते हैं। समग्र विश्व नाटक का 
यह अन्तिम दृश्य चल रहा है इसलिए 
याद रखो 


॥४, पी ७! 


“ऑ “० “२. 


वा अर 


>> 


त्याए़ 


- ब्र.कु. निर्मला अग्रवाल, शुजालपुर मण्डी (म.प्र.) 
नवयुग का करने निर्माण, नारी बनी कल्याणी है। 
पवित्रता की ओढ़ के चूनर, सज निकली आज भवानी है।। ॥* 
दिव्य गुणों को करके धारण, चली बनाने जग को पावन | 
शिव का लेकर के संदेश, नारी कर रही आगवानी है।। 

नारी बनी 

दुःख-अशान्ति को करने दूर, अष्ठ शक्तियों से भरपूर | 

परिवर्तन का बिगुल बजाने, महाविनाश का बोध कराने 

ज्वाला रूप निशानी है | 

नारी बनी .... 


ऊँच-नीच का भेद मिटाने, नारी बनी वरदानी है।। 
नारी बनी .... 
माँ की मम॒ता भी उसमें, सँवारने की क्षमता भी उसमें । 


उसका अब बदला रूप, अबला नहीं जगदम्बा स्वरूप 
शिव ने दी समझानी है।। 
नारी बनी 


हर नगर में, हर गाँव में , हर आँगन में हर राह में | | 


धरती पर स्वर्ण बनाने को, पवित्रता की ज्योत जगाती हैं 
हर कल्प की यही सत्य कहानी है।। 


| शिव शक्तियाँ ये कहलाती हैं, शिव का ही ज्ञान सुनाती हैं। ' 


नवयुग का करने निर्माण, नारी बनी कल्याणी है।। 


“ 





वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


]] 


तीन यात्री 


अल ०७०+क9>9ल<००-+८न्‍<त - ब्रकु ,उर्मिला हे शान्तिवन 24 





पात्र परिचय - 


कहानी से कम 





तेजस्वी - आयु अज्ञात 
(धेहरे पर दिव्य तेज और एकाग्रता) 





नवयुवक - आयु 30 वर्ष, चेहरे पर उमंग-उत्साह 
वृद्ध - आयु 80 वर्ष, अनुभवमूर्त चेहरा 


नहीं है। सुनोगे तो 

आश्चर्यचकित 

रह जाओगे। 
तेजस्वी - 





(छुबह के धीरे-धीरे फैलते 
उजाले में तीन यात्री सड़क पर थोडी- 
थोड़ी दूरी से जा रहे हैं। प्रातः की 
निरव शान्ति ने उनकी चाल में स्फर्ति 
और वाज़गी भर दी है। सहसा लकड़ी 
की खट-खट की आवाज़ सुनकर 
आगे चल रह् नवयुवक यात्री पीछे 
गुड़ कर वेखता है और अपने प्रीछे 
आते वृद्ध को साथ लेने के लिए रुक 
जाता है। क्षीेरे-धीरे उजाला और फैल 
जाता है। पीछे मुड़ने पर उसे वृद्ध के 
भी प्रीछे एक और यात्री के होने का 
अच्चेशा होता है। वह वृद्ध को रोक 
कर उसे भी साध ले लेता है और इस 
प्रकार तीनों यात्री साथ-साथ आगे 
बढ़ने लगते हैं) 

वृद्ध (नगव्युवक से) - कहो, 
कहाँ से आ रहे हो, कहाँ जा रहे हो ? 

नवयुवक - (आँखों में चमक 
लिए) मैं कहाँ से आ रहा हूँ और 
कहाँ जा रहा हूँ, इसका वर्णन किसी 


(2 


सुनाइए, शीघ्रता 
से प्रारम्भ कीजिए । 

नवयुवक - मुझे बाल्यकाल 
से ही भ्रमण का शौक है। भारत के 
विभिनन क्षेत्रों की यात्राएँ करते-करते 
कई दिन गुज़ार देता हूँ। अभी मैं बर्फ 
आच्छादित रोहतांग दर्र की यात्रा से 
आ रहा हूँ। आहा | कितना रोमांचक 
है उत्ताल गगनचुम्बी बर्फीली चोटियों 
पर चढ़ कर नीचे की गहरी खाइयों 
में झाँकना। सारा अस्तित्व सिहर 
उठता है। इन खाइयों में जीवनोपयोगी 
चीज़ों का कठिनाई से नियोजन करते 
किसान और पशुपालक वास्तव में 
वन्दनीय हैं। रोहतांग का यह रास्ता 
एक ही पहाड़ी के एक ही तरफ से 
बनी घुमावदार सड़क से होकर ऊपर 
पहुँचता है। अत्यधिक ठण्ड के कारण 
चट्टानों पर फैली मिट्टी में, जले हुए 
घास के अलावा कोई हरियाली नज़र 
नहीं आती। बर्फ से ढकी चोटियाँ 
भगवान से बातें करते किसी अचल 


योगी जैसी शान्त और स्थिर नज़र 
आती हैं। तेरह हज़ार फीट की ऊँचाई 
पर बेहद ठण्डी हवा बदन को चीर 
कर निकलती हुई महसूस होती है, 
फिर भी आनन्द आता है। अनेक 
पौराणिक महत्त्व के यादगार भी वहाँ 
देखने को मिले जिन्होंने भारतीय 
मनीषियों के त्याग, तप, एकान्त 
चिन्तन और अनासक्त जीवन की 
बरबस याद दिलाई। 

(नवयुवक बात पूरी कर लेता 
है, चुप्पी छा जाती है। केवल वृद्ध 
की लम्बी सॉँसें ही इस चुप्पी को भंग 
कर रही है।) 

नवयुवक - आप करें तो उस 
पेड़ के नीचे थोड़ा ठहरें | 

वृद्ध - ठीक कहा आपने, थोड़ा 
बैठेंगे तो मैं भी कुछ कह सकने में 
समर्थ होऊँगा। 

नवयुवक - हाँ, हाँ, आपके 
चेहरे से ही झलक रहा है कि आपके 
पास अनुभवों की विशाल खान है। 

(वीनों वृक्ष के नीचे बैठते है) 

वृद्ध - ठीक कहा आपने, मेरे 
पास इस शरीर के साथ 80 वर्ष की 
गई यात्रा का अनुभव है। कितने ही 
गाँव, शहर, दृश्य, घटनाएँ इस यात्रा 
में देखे हैं परन्तु दुनिया बहुत बदल 
गई है। मैं आठ-दस साल की आयु 
तक तो मिट्टी के घर बनाता और 
तोड़ता ही रहा। फिर मौलवी जी से 
पेड़ की छाँव में बैठ कर थोड़ा हिसाब 
और भाषा-ज्ञान सीखा। भारत-पाक 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


+--*»(9६४२४७/७७०------*- चानाकूठ -+-+*०७६९९७७: 


विभाजन के समय मेरे माता-पिता 
मुझसे बिछुड़ गए। मैं भारत में आ 
गया, एक होटल पर बर्तन माँज कर 
गुज़ारा करने लगा। एक दिन मुझ 
पर चोरी का इल्ज़ाम लगा और नौकरी 
से निकाल दिया गया | दु:ख तो बहुत 
हुआ पर हिम्मत नहीं हारी। मुझे 
विश्वास था कि मैं सच्चा हूँ और सच 
की नाव डूबती नहीं है। थोड़े दिन बाद 
एक सेठ के यहाँ कपड़े की दुकान 
पर नौकर हो गया। मेरी मेहनत और 
कमर्ठता से सेठजी खुश हुए। मरते 
समय अपने पुत्र से कह गए कि इसे 
शरण दिए रखना । अब मेरा बेटा मेरी 
जगह उसी दुकान पर सेवा करता 
है। मैंने अपना मन भगवान के भजनों 
में रमा लिया है। अब तो यात्रा का 
अन्तिम पड़ाव आ पहुँचा है, केवल 
भगवान के बुलावे का इन्तज़ार है। 
नवयुवक - अरे, आपने तो 
जीवन की 80 वर्ष की यात्रा का 
साक्षात्कार चन्द घड़ियों में करवा 
दिया, सचमुच आप चिन्तनशील हैं। 
(तीनों एन: चल पड़ते है) 
तेजस्वी - (अपनी लम्बी चुप्पी 
को वोड़ते हुए) क्या आप जानते हैं 
कि इससे बड़ी भी एक यात्रा है जिसका 
अनुभव मेरे पास है। 
नवयुवक - (आशएचर्य से) 
इससे भी बड़ी यात्रा! आपके पास 
पिछले जन्म की यात्रा का ज्ञान 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


है क्या ? 

तेजस्वी - पीछे के एक जन्म 
की नहीं बल्कि 84 जन्मों की यात्रा 
का ज्ञान है। 

वृद्ध - बेटा, तुमको 84 जन्म 
कैसे याद रह गए, जिन लोगों के 
किस्से अखबारों में छपते हैं वे तो 
एक जन्म (पिछले जन्म) की बातें 
सुनाते हैं, 84 जन्मों की तो 
नहीं सुनाते। 

तेजस्वी - आप ठीक कहते हैं। 
कोई भी मानव आत्मा अपने 84 जन्मों 
की कहानी न याद रख सकती है और 
न सुना सकती है। आत्मा तो भूमिका 
निभाती जाती है और भूलती जाती 
है। परन्तु जैसे कि एक निदेशक को 
नाटक के सारे दृश्य, सारे पात्र, कहानी 
की सारी जटिलताएँ और घटनाओं 
के सब उतार-चढ़ाव याद रहते हैं उसी 
प्रकार, भगवान को भी सर्व 
मनुष्यात्माओं के 84 जन्मों की कहानी 
तथा सृष्टि-ड्रामा के आदि-मध्य-अन्त 
का सारा ज्ञान रहता है। वे सृष्टि- 
नाटक के रचयिता, निदेशक और 
सर्व मुख्य अभिनेता हैं इसलिए उन्हें 
ज्ञान का सागर कहा जाता है। जैसे 
कोई बुजुर्ग व्यक्ति अपने पोत्रों को 
पुराने समय .की कहानियाँ सुनाया 
करंता है, उसी प्रकार, परमात्मा पिता 
भी सृष्टि के आदि-मध्य-अन्त की 
कहानी अपने सारे बच्चों को सुनाते 


हैं परन्तु सुनाते हैं कलियुग के अन्त 
में जबकि सृष्टि-ड्रामा का अन्त निकट 
पहुँच जाता है। अभी वही समय चल 
रहा है। भगवान सत्य कहानी सुना 
रहे हैं। (दोनों के चेहरे को निह्ारता 
है और उन्हें ध्यानएूर्वक, रुचिपूर्वक 
सुनते देख आगे कहता है) 

भक्ति मार्ग की श्रीमद्भगवद- 
गीता में, आटे में नमक की तरह इस 
सत्य का उद्घाटन हुआ है। भगवान 
ने मुझ आत्मा के 84 जन्मों का जो 
सत्य वर्णन सुनाया है, उसे मैं अनुभव 
के जल से सींच कर आपके सम्मुख 
प्रस्तुत कर रहा हूँ, सुनिए, सतयुग 
के प्रारम्भ में मैं आत्मा एक देदिप्यमान 
कण के समान इस सृष्टि-मंच पर आई 
और देवताई चोला पहन, 6 कला 
से सम्पन्न भूमिका निभाई । उस समय 
सृष्टि का हर अवयव पूर्ण सतोप्रधान 
था। कम जनसंख्या थी। समृद्धि 
00% थी। हर मानव देव समान था। 
सभी स्वरूपस्थ थे | प्रकृति, प्राणी तथा 
मानव सभी का पारस्परिक प्रेम और 
सद्भाव अठूट था। श्री लक्ष्मी तथा 
श्री नारायण के अटल, अखण्ड राज्य 
की छत्रछाया में सभी प्रसन्‍नचित्त और 
आनन्दित हो रहते थे। सदा युवावस्था, 
कंचन जैसी काया, सुखदाई सम्बन्ध 
और पूरी आयु सभी को प्राप्त थी। 
इसके बाद त्रेतायुग में मैं चन्द्रवंशी 
बना और श्री सीता तथा श्री राम के 


॥3 


9७९8७ बछानाकूल'-+-.7+०७ 


राज्य में सुख-शान्ति सम्पन्न जीवन 
व्यतीत किया। इस राज्य में भी सभी 
पुरुषोत्तम थे। सदगुणों से सम्पन्न थे। 
प्रकृति दासी थी। मौसम सदाबहारी 
था। आवश्यकता से कई गुणा अधिक 
प्राप्तियाँ थीं सभी की । रानी तथा राजा 
का सन्तानवत्‌ प्रेम सभी को प्राप्त 
था। इसके बाद आया द्वापरयुग | उसमें 
रावण (प्रॉचविकार) का जन्म हुआ, 
मैं आत्मा उसके पंजे में फँस गई। 
दुःख मिला तो भगवान की भक्ति 
प्रारम्भ की परन्तु मेरी कलाएँ उतरती 
ही गईं। इस युग में सभी राजा धर्म- 
कर्म को मानने वाले और मानवीय 
गुणों से सम्पन्न थे। भक्ति के लिए 
बड़े-बड़े मन्दिरों का निर्माण भी उन्होंने 
करवाया। वचन के पक्के थे। शास्त्रों 
की रचना भी इसी युग में हुईं। समाज 
चार वर्णों में विभक्त हुआ तो जातिभेद 
सिर उठाने लगा। फिर अनेक धर्मों 


के आगमन से धर्म-भेद का भी पाँव 


पसरा परन्तु फिर भी लोग मूल्यों को, 
सदगुणों को महत्त्व देते थे। इस युग 
में कलाएँ गिरते-गिरते कलियुग आने 
तक कायाकला पूर्ण चट हो गई। 
कलियुग में रावण का प्रकोप अति 
हो गया। चारों तरफ पापाचार, 
अनाचार, दुराचार की रात छा गई। 
न नीति रही, न प्रीति रही और न 
किसी को किसी से भीति रही । मानव 
निशाचर बन गया | खान-पान, दृष्टि- 


44 





वृत्ति, बोल-चाल, कर्म-व्यवहार सब 
विकृत हो गए। देहाभिमान जनित 
काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार का 
सरेआम ताण्डव होने लगा। हर 
आदमी लेवता और स्वार्थ बन गया। 
नारी जाति असंख्य कष्टों और 
अमर्यादाओं से घिर गई। तब दयालु 
प्रभु साधारण मानवीय तन (प्रजाणिता 
ब्रह्म) में अवतरित हो गए और 
राजयोग की शिक्षा देने लगे। मुझे 
भी भगवान ने चुना, राजयोग सिखाया 
और अब मैं राजयोग के अभ्यास से 
खोए हुए दैवी पद को पाने का पुनः 
पुरुषार्थ कर रहा हूँ। 

वृद्ध तथा नवयुवक - (एक 





स्व॒त्‌: आत्म-दृष्टि सभी की, वहाँ न होता विष्‌य्‌ विकार। . 
प्रकृति भी होती सुखदाई, सदा ही रहती बसंत्‌ बहार।। 


स्वर्ग की झलक 


- ब्र.कु. दिनेश इंगोले, इन्दौर 


बाबा मेरा ला रहा वो दुनिया, होगी जहाँ सुखों की भ्रमार। 
हर चेहरे प्र खुशी झलकती, हर दिल में बसता प्यार-ही-प्यार।। 


कलह-क्लेश की बात नहीं कुछ, सम्पन्न्‌ रहता हर परिवार। 
हर आत्मा वहाँ हर्षित्‌ रहती, चलें सभी के समर्थ विचार।। 


साध) इस यात्रा का वर्णन सुन कर 
तो हमारी दो आँखों के साथ-साथ 
तीसरी आँख भी खुलने लगी है। और 
यह कहानी आपके साथ-साथ हमारी 
भी है, ऐसा अनुभव होने लगा है। 

तेजस्वी - अगर ऐसा है तो मैं 
अपने उद्देश्य में सफल हो गया हूँ। 
मेरी शुभकामना है कि मेरी तरह 
84 जन्मों की कहानी, भगवान की 
जबानी जान कर आप भी आने वाली 
सतयुगी दुनिया में राजभाग के 
अधिकारी बन जाएँ। 

दोनों - (एक साथ) अवश्य 
बनेंगे। 

$+ 





वहाँ ना डॉक्टर, नीम, हकीम, होता ही नहीं वहाँ कोई बीमार। _ 
स्व॒त: ही होता वहाँ मनोरंजन, संगीत सुनाती नदियों की धार।। . 


जाना है ग्र उस दुनिया में, तो पहले बनना होगा इस संगम्‌ पर। 
सही रूप में ब्रह्माकुमारी और ब्रह्माकुमार 


तभी मिलेगा स्व॒र्ग का अधिकार।। 


बूंद 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 








्् 4 चर /: आम ह ] ॥ ' हि २७४) 

8280 « है ० 9 हि 
के है & ७_ कम, 2. ४ का ६ #ँ ४ | | 323... के दे 2 
, देहली (मालवीय नगर)- महिला दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में सम्बोधित करते हुए सांसद भ्राता विजय कुमार मल्होत्रा । मंच पर जनता दल सचिव भ्राता शेरसिंह 
डांगर, ब्र.कु. सुन्दरी बहन व ब्र.कु. आशा बहन भी उपस्थित हैं। 2. देहली (राजौरी गार्डन)- शिवध्वजारोहण के पश्चात्‌ प्रतिज्ञा करते हुए विधायक भ्राता करण सिंह तंवर । ब्र,कु, 
दादी रुक्मिणी बहन, ब्र.कु. शक्ति बहन तथा ब्र.कु. जवाहर मेहता भी साथ में हैं। 3, देहली (रानीबाग)- शिवरात्रि मेले में आयोजित आध्यात्मिक चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन करते 

५५४०८ भ्राता जयभगवान, ब्र.कु, सरला बहन, ब्र.कु. रजनी बहन तथा अन्य | 4, कानपुर (कल्याणपुर)- कानपुर विश्वविद्यालय के कुलसचिव ्राता वी,के. पाण्डेय जी को 
ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. उमा बहन तथा ब्र.कु. नीलम बहन। 5 , देहली (जंगपुरा)- आध्यात्मिक चित्र प्रदर्शनी के उद्घाटन अवसर पर ईश्वरीय स्मृति में हैं विधायक भ्राता 
तरविन्द्र मरवाह, थोक विक्रेता भ्राता हरिराम गुप्ता, आर्किटेक्ट भ्राता बलराज तनेजा, ब्र.कु. चन्द्र बहन तथा ब्र.कु , जया बहन। 6. नई देहली (महिपालपुर)- आध्यात्मिक कार्यक्रम 
का उद्घाटन करते हुए विधायक भ्राता विजय लोचव, कांग्रेस महिला मण्डल अध्यक्षा बहन रोशनी, ब्र.कु. अनुसूइया बहन तथा अन्य। 7 , नई देहली (इन्द्रपुरी)- शोभा-यात्रा को 
शिवध्वज दिखा कर रवाना करते हुए विधायक प्राता पूर्णचन्द योगी । ब्र.कु. बाला बहन तथा ब्र.कु. सावित्री बहन साथ में हैं। 8. मोहम्मदाबाद- ग्रामप्रधान सम्मान समारोह का उद्घाटन 
करते हुए सांसद भ्राता चन्द्रभूषण सिंह, विधायक भ्राता नरेन्द्र सिंह यादव, ब्र.कु. सुमन बहन, पुलिस के पूर्व महानिरीक्षक भ्राता भारत सिंह तथा अन्य । 











।. बांदा- स्नेह मिलन कार्यक्रम के पश्चात्‌ सिटी न्यायाधीश जी को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. गीता। 2. लखनऊ (आलमबाग) - पॉलीटेव्निकल कॉलेज के प्रधानाचार्य भ्राता 
वी.पी. पाण्डे को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. चेतना बहन | 3. मुरादनगर- ओ.एफ .एम. के वरिष्ठ महाप्रबन्धक भ्राता ए.के. दास को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. लक्ष्मी 
बहन। 4, फतेहगढ़- युवा जागृति सम्मेलन में जागृति बहन को सम्मान भेंट करते हुए डॉ. भ्राता ओ.पी. गुप्ता जी। 5 . फर्रुखाबाद (तिर्बाखास)- जिलाधिकारी भ्राता आर.के. 
भटनागर को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. मन्‍्जू बहन। 6. सीतापुर- एस.डी.एम भ्राता देवेन्द्र पाण्डेय को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. योगेश्वरी बहन । 7 , देहली (जमुना 
विहार)- शोभायात्रा को शिवध्वज दिखा कर रवाना करते हुए थानाध्यक्ष जी । ब्र.कु, लक्ष्मी तथा ब्र,कु. सविता बहन साथ में हैं। 8. हाथरस (आनन्दपुरी)- सर्व धर्म समन्वय 
कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए अतिथिगण। 9. देहली (दिलशाद कॉलोनी)- आध्यात्मिक चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए एस्,एच,ओ, भ्राता वाई.के. त्यागी, ब्र.कु, इन्द्र 
बहन तथा अन्य। 0 , हरदोई- शिवध्वजारोहण के पश्चात्‌ न्यायाधीश भ्राता सुखलाल भारती, ब्र.कु. शशि बहन तथा अन्य ईश्वरीय स्मृति में | ] . फर्रुखाबाद (ओम निवास)- 
नारी सशक्तिकरण कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए पूर्व मज्री डॉ. बहन प्रभा द्विवेदी, भारत विकास परिषद की अध्यक्षा डॉ, बहन पुष्पा सूद, बहन चित्रा अग्निहोत्री तथा ब्र.कु. शोभा। 





, इटावा- शिवरात्रि महोत्सव में मंच पर विराजमान हैं ब्र.कु. ज्योत्स्ना बहन, प्रोफेसर भ्राता विद्याकान्त तिवारी, एडवोकेट भ्राता सिद्धनाथ पाण्डेय, कॉलेज प्रबन्धक भ्राता लक्ष्मीपति 
वर्मा तथा अन्य | 2, नई देहली- उत्तर रेलवे मुख्यालय में “परिवर्तन प्रबन्धन” विषय पर आयोजित कार्यक्रम में मंच पर हैं मार्सिलो बल्क, कोलम्बिया, ब्र.कु. पीयूष भाई तथा अन्य | 
3. गोरखपुर- केन्द्रीय कारागार में अधिकारियों तथा कर्मचारियों को राजयोग की शिक्षा देने के बाद ब्र.कु. पुष्पा बहन, ब्र.कु. सुरेन्द्र बहन, जेल अधीक्षक भ्राता बी.के. जैन, उप- 
जेल अधीक्षक भ्राता वर्मा जी तथा अन्य समूह चित्रों में । 4. अलीगढ़ (रघुवीरपुरी)- जौफरी गाँव में ग्राम विकास सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए हितैषी बाबा, ब्र.कु. लक्ष्मी, ब्र.कु. 
राज, ब्र.कु. सुदेश बहन, ब्र.कु. बालकृष्ण भाई तथा अन्य । 5 , छज्जूपुर- शोभायात्रा में उपस्थित हैं पत्रकार भ्राता अनिल शर्मा, व्यवसायी भ्राता विजय शर्मा, ब्र.कु. लक्ष्मी बहन तथा 
अन्य। 6. खुर्जा- शिवध्वजारोहण करती हुई ब्र.कु. सन्‍्तोष बहन, ब्र.कु. तारा बहन, ब्र.कु, रामप्रताप भाई तथा अन्य भाई-बहनें । 7 . देहली (उत्तम नगर)- शिव सन्देश रथ के 
साथ ग्राम सेवार्थ जाते हुए सेवाधारी भाई-बहनें। 8. सुलतानपुर- आध्यात्मिक चित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन करते हुए जिला परिषद अध्यक्ष भ्राता राजकिशोर सिंह। साथ में ब्र.कु. दुर्गा । 





, आगरा (कमला नगर)- तनाव मुक्त प्रबन्धन कोर्स की समाप्ति पर डिप्टी कमांडर भ्राता हिमांशु पाण्डेय, ब्र.कु . विमला बहन को स्मृति-चिन्ह देते हुए। 2 , पुखरायां- सांसद भ्राता 
रामनाथ कोविन्द को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु . अनुराधा बहन । 3. बरेली- विधायक भ्राता राजेश अग्रवाल को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. पार्वती बहन | 4, देहली 
(लॉरेन्स रोड)- विधायक भ्राता अनिल भारद्वाज को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. लक्ष्मी बहन। 5. देहली (वेस्ट पटेल नगर)- शिवध्वजारोहण के समय ईश्वरीय स्मृति में 
हैं प्रसिद्ध समाज सेविका व फिल्‍म अभिनेत्री बहन नफीसा अली, ब्र.कु, कृष्णा बहन, ब्र.कु. सुलोचना बहन तथा अन्य । 6. बाराबंकी- अपर जिला न्यायाधीश भ्राता आर,के, पाण्डे 
को ईश्वरीय सन्देश देती हुईं ब्र.कु, मीनू बहन । 7 . फतेहपुर (अरबपुर)- शिव जयन्ती महोत्सव का उद्घाटन करते हुए इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति भ्राता आर.बी, 
मिश्रा, जिलाधिकारी भ्राता महावीर यादव, कार्यवाहक जिला न्यायाधीश ्राता राजेन्द्र पाल तथा ब्र.कु, नीरू बहन | 8. लखनऊ (इन्दिरा नगर)- मेयर भ्राता एस.सी. राय तथा बहन 
राय के साथ ज्ञान-चर्चा के बाद ब्र.कु. जयश्री बहन, ब्र.कु. अन्जू बहन तथा ब्र.कु. अरुण भाई समूह चित्र में। 9, फतेहपुर- पत्रकार वार्ता का उद्घाटन करते हुए वरिष्ठ पत्रकार बच्धु, 
ब्र.कु. दुलारी बहन तथा ब्र.कु. गीता बहन । 0 , देहली (निहाल बिहार)- विधायक भ्राता विजेन्द्र सिंह, ब्र.कु. अरुणा बहन, ब्र.कु. सुमन बहन, ब्र.कु. सुरेश भाई तथा अन्य 
शिवध्वजारोहण करते हुए। 


सुखद आभास (फील गुड) 
8 %००००-००--०---०० ०००७०» प्र कु पी यूप , सिरी फो ्ट, नर्ई दिल्‍ली 


जकल कहीं भी जाइये 
ञञा सभी के मुख पर एक ही 
शब्द चढ़ा हुआ है - सुखद आभास। 
सुन कर सचमुच बहुत अच्छा लगता 
है। लोग आश्चर्य चकित हैं तथा यह 
देखने का प्रयास कर रहे हैं कि 
आखिर यह फील गुड फैक्टर है 
क्या ? एक मोटे अनुमान के अनुरूप 
केन्द्रीय सरकार ने सुखद आभास को 
प्रचारित-प्रसारित करने के लिए 
करोड़ों रुपये बहा दिये। एक समय 
तो देश के प्रत्येक समाचार पत्र, 
समाचार चैनल,आम नागरिक, 
सामान्य कार्यालय आदि हर स्थान 
पर फील गुड फैक्टर की ही चर्चा 
थी। आज भी सुखद आभास एक 
ऐसा विषय बन गया है जिसे आम 
आदमी से लेकर, नौकरी पेशा वर्ग, 
व्यापारी वर्ग, छात्र समूह, राजनेता 
आदि सभी अपनी-अपनी तरह से 
विश्लेषित और परिभाषित कर 
रहे हैं। 
कई लोग कहते हैं कि भारत 
प्रगति के पथ पर अग्रसर है, चहुँ ओर 
खुशहाली है। लोगों की आय में 
बढ़ोतरी हो रही है। भारत की 
अर्थव्यवस्था शीर्ष पर है, विदेशी मुद्रा 
के भण्डार भरे पड़े हैं तथा संचार क्रांति 
हर दिन नये प्रतिमान स्थापित कर 
रही है। अब तो सचल फोन 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


(मोबाइल) भी आम आदमी की पहुँच 
में आ गये हैं। एक बार तो सुनकर 
लगता है कि सचमुच सुखद अहसास 
है, यह यथार्थ है। मन को लगता है 
कि यह कोई दिवास्वप्न नहीं अपितु 
वर्तमान की सत्यता है। लेकिन इसकी 
गुह्यता में जायें तो पता लगता है कि 
उपरोक्त विकास तो सिक्के का एक 
ही पहलू है। उन्‍नति का एक दूसरा 
पक्ष भी है। यह सब जो प्रगति हम 
देख रहे हैं यह तो मात्र बाह्य है, क्षणिक 
है, विनाशी है तथा सीमित है। वास्तव 
में तरक्की तो उसे कहेंगे जब व्यक्ति 
का सम्पूर्ण विकास हो, हर आदमी 
मानसिक, शारीरिक, सामाजिक और 
आध्यात्मिक रूप से सम्पन्न हो। 
समाज के निम्नतम वर्ग को भी जीवन 
की मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध हों, 
भ्रातृत्व भावना सर्वत्र हो, व्यवहार 
कुशलता हो, महिलाओं को उचित 
सम्मान मिले तथा हर आदमी में 
मानवता हो। तभी कह सकते हैं कि 
सुखद आभास हो रहा है, देश के सभी 
नागरिक अच्छा अनुभव कर रहे हैं 
तथा सभी जन प्रगति के पथ पर 
अग्रसर हो रहे हैं। 

सीमित सुखद आभास को 
सम्पूर्ण और सर्वग्राह्य सुखद अहसास 
बनाने का कार्य मानवीय, नैतिक और 
आध्यात्मिक गुणों की धारणा से ही 


हो सकता है। कुछ बातों का वर्णन 
नीचे किया जा रहा है - 

. सच्ची देश भक्ति की भावना 
जागृत करें - आज सर्वाधिक 
आवश्यकता देश के सभी नागरिकों 
के मन में सच्ची देश भक्ति की भावना 
जागृत करने की है। देशवासी स्वयं 
को बंगाली, पंजाबी, मराठी, बिहारी 
अथवा गुजराती समझने से पूर्व 
भारतीय समझें तो स्वत: ही सर्वत्र 
सुखद आभास की भावना जागृत हो 
जायेगी। ऐसे माहौल में एक भारतीय 
यदि किसी अभाव से ग्रसित होगा तो 
दूसरा भारतीय अवश्य ही उसकी 
मदद करेगा। इस तरह सभी जन 
खुशनुमा अहसास कर सकेंगे। 

2. जीवन में मूल्यों का समावेश 
हो - कोई व्यक्ति उच्च शिक्षित हो, 
उच्च पदासीन हो लेकिन यदि उसके 
जीवन में मूल्य न हों तो वह एक ऐसे 
खजूर के वृक्ष के समान होता है कि 
जिससे राह चलने वाले पथिकों को 
न तो छाँव ही मिलती है और न ही 
फल प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत 
मूल्ययुक्त व्यक्ति सभी के साथ 
अपनत्व भाव से चलता है। वह विपत्ति 
के समय दूसरों की सहायता करने 
को भी तत्पर रहता है। ऐसे वातावरण 
में प्रत्येक व्यक्ति स्वत: ही सुखद 
आभास करता है। 


9 


७७९९) ४६१९/७)७७०-----*- बचाउनादूत | ++---+*»09 ६२ 


3, सभी कर्मयोगी बनें - गीता में 
कर्मयोग के विषय में विस्तार से 
बताया गया है। आज के भागते जीवन 
में कर्मों में योग के समावेश की 
अत्यधिक आवश्यकता है। कई लोग 
कहते हैं कि जब हम कर्म करते हैं 
तो केवल कार्य पर ही ध्यान देते हैं। 
यह कथन सुनने में भले ही अच्छा 
लगे लेकिन यथार्थ से सर्वथा परे है। 
कर्म यदि प्रभु को समर्पित होकर किये 
जायें तो सफलता सुनिश्चित होती 
है, निश्चिंतता भी बनी रहती हैं तथा 
तनाव की सम्भावनाएँ भी क्षीण हो 
जाती हैं। ऐसा व्यक्ति ही सही अर्थों 
में सुखद अहसास कर सकता है। 

4, शिक्षा के साथ दीक्षा भी हो - 
आज भारत में शिक्षित युवाओं की 
बहुत बड़ी जमात है लेकिन उन्हें 
नौकरी नहीं मिलती है। दूसरी ओर 
रोज़गार दाता कम्पनियों का कहना 
है कि उनके पास नौकरियाँ तो हैं 
लेकिन योग्य व्यक्ति नहीं मिलते हैं। 
इस विरोधाभास को दूर करने का 
सरल उपाय है कि युवाओं को मात्र 
कागज़ी शिक्षा ही न दी जाय अपितु 
उनमें सुसंस्कार भरे जायें। मात्र 
भौतिक शिक्षा किसी व्यक्ति को श्रेष्ठ 
नागरिक नहीं बना सकती है। वास्तव 
में भौतिक शिक्षा के साथ व्यवहार- 
विज्ञान सीखने की भी आज महती 
ज़रूरत है। मानवीय और 
आध्यात्मिक मूल्यों से ओत-प्रोत युवा 
स्वयं तो ये मी आह पाक के हो. 5 5 आल 2 डक. अं आन 


20 


साथ ही अपने अभिभावकों, समाज 
और देश को भी सुखद अहसास 
कराने के निमित्त बन सकते हैं। 

तो आइये, हम अपने अंदर 
सम्पूर्ण सुखद अहसास को जागृत 
करें। इसी आंतरिक आनन्द को शात्रों 
में अतीन्द्रिय सुख की संज्ञा दी गई 
है। यदि कोई व्यक्ति एक बार 
अतीन्द्रिय सुख का अनुभव कर ले 
तो वह फिर कभी भी भौतिक सुख- 


साधनों की ओर लालायित नहीं होता 
है। वह साधनों का प्रयोग साधना के 
लिए तो करेगा लेकिन स्थूल साधनों 
पर स्वयं आश्रित नहीं होगा। ऐसी 
सर्वोच्च स्थिति ही सदाकालिक सुखद 
आभास है। इससे समस्त देश और 
वसुधा पर शान्ति की स्थापना हो 
जायेगी तथा प्रत्येक घर में सच्चा 
रामराज्य आ जायेगा। 
है जज 


+* शा + आए + सा + शाछ ९ सछ ९ 9 + ७ + था + 9 +* ७ + सा + आछ + 


आस +* शा +* आए + आ + बात +* आए + शा + शक + शक + आए +* सा + शा * सात # ७ ७ आए 


ज्जीवानला व्द्ृ्थधव्आा | 
ब्र.कु. यमसिंह, रेगड़ी | 

कर्मयोगी बन कर जो करना है अपने आपकर। | 
दर्पण अपने दिल का, पहले साफ कर।। ५ 
रखनी है, अपनी मीठी, मुधर ज़्बान। ५ 
इसके लिए जरूरी है, शुद्ध-निर्मल खान और पान।। | 
जिन्दगी में भूल कर भी ना कोई पाप कर। | 
दर्पण तू अपने दिल का ...।। 

दूर रहना सदा व्यसनों से, बनना है बलवान। ६ 
सच्चा उन्नति का पथ यही, ले इसको पहचान।। _ | 
पवित्रता से, प्रभु-प्यार आएगा नजर। के 

दर्पण तू अपने दिल का ...।। | 

कमी ना आए निश्चय में, रहना सदा च्रित्रवान। || 
रोक सकें ना बढ़ते कदम, बड़े-बड़े तूफान।। ॥ 
बुझते दीपक रोशन हों, पुण्य का यह काम कर। $ 
दर्पण तू अपने दिल का ...।। । 

हो बड़ों का आदर मान, हो नारी का सम्मान। | 
श्रेष्ठ समय अब, मिल सकते हैं मुँह माँगे वरदान।।. * 
शान्ति-शक्ति-दया नहीं मिलते मोल किधर। ॥ 
दर्पण तू अपने दिल का ...।। 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष 


क्या जीवन धुएँ में उड़ाने के लिए है? 


गर किसी से पूछा जाए कि 
ऊन कया आप भीख माँगना 
पसंद करेंगे ? तो वह यही कहेगा कि 
नहीं। क्योंकि कहा जाता है - 'माँगने 
से मरना भला'। लेकिन बीड़ी पीने 
वाले व्यक्ति इस कहावत को उलट 
देते हैं। उन्हें माँग कर बीड़ी पीने में 
कोई शर्म महसूस नहीं होती। वे 
स्वेच्छा से माँगने और मरने के रास्ते 
पर बढ़ चलते हैं। सिगरेट, बीड़ी या 
अन्य किसी भी रूप में तम्बाकू पीना 
माना धीमा ज़हर खाना। कहा जाता 
है कि ज़हर तो मुफ्त मिले तो भी 
नहीं खाना चाहिए परन्तु मनुष्य की 
बुद्धि को कया कहें? वह पैसे खर्च 
करके भी इस ज़हर को खरीदता है 
और अकाल मृत्यु को आमंत्रण देता 
है। सिगरेट या बीड़ी आदि को जला 
कर धुएँ के छल्ले उड़ाने वाला व्यक्ति 
पहले अपने नोटों को जलाता है, फिर 
हृदय, आँत और फेफड़ों को जलाता 
है और फिर अपने पुण्य कर्मों को 
जला कर पश्चाताप की अमिन में 
जलता हुआ संसार से कूच कर 
जाता है। 

जन्म से स्वतंत्र होने का दम 
भरने वाले व्यक्ति की मानसिक 
गुलामी देखिए व्यसन के पैकेट पर 
स्पष्ट लिखा होता है कि यह स्वास्थ्य 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


के लिए हानिकारक है। फिर भी मनुष्य 
इस ज़हर की गुलामी में बंधा हुआ 
इसका वरण करता है। इस गुलामी 
में वह मरने को तैयार है, बिस्तर पर 
तड़पने के लिए तैयार है लेकिन मुक्त 
होने को तैयार नहीं है। आज की 
आधुनिकता भी कितनी अन्धी है। 
व्यसनमुक्त व्यक्ति तो इस 
आधुनिकता को पिछड़ा हुआ ही नज़र 
आता है। विवेकहीन आधुनिकता के 
नाम पर कितने ही किशोर और युवा 
समय से पहले कमर झुकाने को 
मजबूर हो गए हैं। एक बार एक 


- ब्र.कु. ममता, पानीपत 


भारतीय ने विदेश में साहित्य की एक 
दुकान पर नशा विरोधी साहित्य माँगा, 
तो दुकानदार हँसने लगा। भारतीय 
ने हँसने का कारण पूछा। दुकानदार 
ने कहा - मेरी दुकान पर तो लोग 
शराब तथा अन्य व्यसनों को नए- 
नए अन्दाज़ में लेना सीखने आते हैं 
और वैसा ही साहित्य मैं रखता हूँ। 
सोचिए, ऐसे विश्व का भविष्य क्या 
होगा जिसमें सरेआम स्वास्थ्य को 
बिगाड़ने वाली ज़हरीली चीज़ों का 
प्रशिक्षण हर आयु, वर्ग के व्यक्ति 
के लिए सुलभ है। 


व्यसनों के बारे में गलतफहमियाँ 


. तनाव कम होगा - आज के युग को यदि तनाव का युग कहें तो कोई 
अतिशयोक्ति न होगी। आज इंसान को छोटी-सी बात का भी तनाव हो जाता 
है। चाहे किसी भी वर्ग का व्यक्ति हो, तनाव से तो ग्रसित ही मिलेगा। तनाव 
को दूर करने के लिए या थोड़ी देर ग़म भूलने के लिए वह व्यसनों का सहारा 
लेता है लेकिन वह अपने से धोखा करता है। व्यसनों से मानसिक तनाव और 
ज्यादा बढ़ता है, ना कि कम होता है। 

2. शान्ति मिलेगी - घर में बढ़ते कलह-क्लेश को देख कर आजकल बच्चे 
भी अपने ही घर से दूर भागते हैं। वे घर की अशान्ति से तंग आ जाते हैं। माँ- 
बाप का सही पालन-पोषण न मिलने पर वे व्यसनों का सहारा लेते हैं। वे 
सोचते हैं कि व्यसनों के सहारे मन हल्का हो जाएगा परन्तु होता विपरीत है। 
वे पहले से भी ज्यादा अशान्ति में फँस जाते हैं। 

3.मित्रता बनी रहेगी - अधिकांश लोग व्यसनों के शिकार मित्रों के बार- 
बार आग्रह करने से होते हैं। वे शुरू में थोड़ा व्यसन इसलिए लेते हैं ताकि 
मित्र नाराज़ न हो जाएँ। लेकिन याद रहे, व्यसनों की आदत थोड़े-से ही शुरू 


2] 





होती है और बाद में व्यक्ति इनका आदी बन जाता है। जीवन को बिगाड़ने 
वाले मित्र नहीं होते, यह गुप्त दुश्मनी हैं। 

4, आधुनिक दिखेंगे .- अधिकतर लोगों पर चलचित्रों का असर बहुत 
जल्दी पड़ जाता है। टी.वी., समाचार-पत्रों आदि में कई विज्ञापन दिखाए 
जाते हैं जैसे कि “वाह कया ताजगी है”” जैसे कि सिगरेट पीने से ताजगी 
मिलती है। और भी कई विज्ञापन होते हैं। लोग इनसे प्रभावित हो जाते हैं और 
अपने को आधुनिक बनाने के लिए इनका सेवन करते हैं। वे अपनी शान- 
शौकत बढ़ाने के लिए दोस्तों के साथ सिगरेट आदि फैशन के तौर पर पीते 
हैं। लेकिन यह आधुनिकता नहीं पिछड़ापन है। अन्तर इतना ही है कि पिछड़े 
युग में मजबूरीवश लोगों के शरीर बीमार होते थे और आधुनिक युग में 
जानबूझ कर बीमारी को बुलाया जाता है। 

मक्ति के उणय 

।. हम यह विचार करें कि बीड़ी व सिगरेट ढाई-तीन इंच की और इंसान 
पाँच-छह फीट का होता है। वैसे तो कोई गुलामी पसन्द नहीं करता लेकिन 
इन चीज़ों के गुलाम क्‍यों? अतः: इन्हें त्याग आत्मा को स्वतन्त्र कर 
लेना चाहिए। 

2, कहा जाता है - 'इन्सान चाहे तो क्या नहीं कर सकता' । यदि वह इसे एक 
बार छोड़ने का दृढ़ संकल्प कर ले तो वह सदा के लिए इसे छोड़ सकता है। 
जैसे कि एक बार एक बच्ची ने अपने पिता से कहा कि आप बीड़ी क्यों पीते 
हैं, क्या यह अच्छी चीज़ है, यदि है तो हमें भी दो। तब से पिता ने बच्ची से 
कहा कि आज के बाद आप मेरे हाथ में बीड़ी कभी नहीं देखोगी | यदि देखोगी 
तो जो चाहे सज़ा देना। उस व्यक्ति ने उस समय दृढ़ संकल्प किया तो फिर 
उसके बाद बीड़ी को हाथ भी नहीं लगाया। इसी प्रकार एक व्यक्ति ने जब 
बीड़ी पीने के लिए दूसरे से माचिस माँगी तो उसने अहंकार दिखाते हुए कहा 
कि इतने चमक-दमक वाले कपड़े पहने हुए हो, क्या 25 पैसे की माचिस 
नहीं रख सकते ? व्यक्ति ने अपने को इतना अपमानित महसूस किया कि 
सदा के लिए बीड़ी से नाता तोड़ लिया। 

3. यदि बच्चे व्यसनों के शिकार हो चुके हैं तो मात-पिता को उनके साथ बैठ 
कर विचार-विमर्श करना चाहिए। बच्चों को समय और स्नेह दें ताकि वे इन 
चीजों से दूर हो जाएँ। उनकी जायज़ इच्छाओं को पूरा करें। उनके दिल की 
बात पूछें कि आपने इन चीजों (व्यसनों) को किस कारण से अपनाया है, 
जीवन में क्या कमी महसूस होती है ? इन बातों से वे अपनापन महसूस करेंगे 


४2.2 





और व्यसनों से दूर होने का प्रयत्न 
करेंगे। 
5. एक उपाय यह भी हो सकता है 
कि व्यसनी के मन में व्यसनों के प्रति 
घृणा-भाव उत्पन्न करें। जब हमें 
किसी चीज़ के प्रति घृणा-भाव इमर्ज 
हो जाता है तो उसको देखने का भी 
दिल नहीं करता। उसके मन में ऐसे 
विचार भरें, जैसे - ये व्यसन तो नाली 
के कीड़े हैं आदि-आदि। 
5. नशा छोड़ने के लिए रुचिकर कार्य 
की ओर ध्यान दें। गीत-संगीत में मन 
को लगाएँ। इससे इन चीज़ों को भूल 
सकते हैं। सकारात्मक चिन्तन करें। 
प्रभु-चिन्तन करें। प्रभु चिन्तन करने 
से मन पावन होने लगता है और तुच्छ 
चीज़ों की ओर से हटने लगता है। 
परमात्मा पिता परम पावन हैं। उनकी 
पावन याद से मन का शुद्धिकरण हो 
जाता है। 

पिछले कई वर्षों से 3। मई को, 
विश्व तम्बाकू निषेध दिवस के रूप 
में मनाया जाता है। इस दिन सरकार 
दूरदर्शन व समाचार पत्रों में विज्ञापन 
प्रसारित करा कर लोगों को व्यसनों 
की हानियों के प्रति जागरूक करती 
है। लेकिन कया ही अच्छा हो यदि 
सरकार व्यसनों के उत्पादन पर रोक 
लगाए. और आध्यात्मिक-नैतिक 
कल्याण-केन्द्रों के द्वारा व्यसनियों के 
पुनर्वास का श्रेष्ठ कार्य करे। 

नै न ०» 


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५3००. "या काकन० «०-८ चल 


...3. रा जन्म तन्‍जानिया (पूर्वी 
+” » अफ्रीका) के एक ब्राह्मण 
परिवार में हुआ। माता-पिता के भक्ति 
के संस्कार मुझमें बचपन से ही आ 
गए। मात्र 47 साल की आयु में 
केनिया (अफ्रीका) में ही एक धार्मिक 
प्रवृत्ति के परिवार में मेरी शादी हो 
गई। मेरा जीवन बहुत सुंदर रीति से 
बीतने लगा। आध्यात्मिक संस्कारों 
की होने के कारण मैं बोलती कम थी 
और मौन में रह कर ही सभी कर्त्तव्य 
पूर्ण करती थी। ईश्वरीय ज्ञान का 
बीज अविनाशी होने के कारण कई 
आत्माओं को इसकी अनुभूति ईश्वर- 
मिलन से पूर्व ही होने लगती है। मेरे 
साथ भी ऐसा ही हुआ। मुझे अनेक 
आध्यात्मिक दृश्य स्मृति में आने लगे, 
दिखने लगे तथा अनुभव भी होने लगे। 
मेरे युगल ब्रिटिश दूताबास के 
प्रशासनिक विभाग में सेवारत थे। हम 
दोनों ही परमप्रिय परमात्मा की खोज 
में लगे रहते थे। हर वर्ष जब उन्हें 
एक मास की छुट्टी मिलती थी तो 
हम भारत में आते थे और भारत के 
सभी तीर्थ स्थानों का भ्रमण करते थे। 
सन्‌ 965 में हम राजस्थान भ्रमण 
पर आए थे लेकिन उस समय यह 
ज्ञान-यज्ञ गुप्त था। हमें प्रभु का 
परिचय मिल नहीं पाया और ईश्वरीय 


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- ब्र.कु. हंसा त्रिवेदी, लंदन 


झलक पाने की तड़प उम्र के साथ- 
साथ बढ़ने लगी। सन्‌ 975 के बाद 
मेरे जीवन में अचानक परिवर्तन आने 
लगे और मुझे अनेक प्रकार के 
साक्षात्कार होने शुरू हो गए। मेरा 
मन भक्ति के बजाए ध्यान की ओर 
आकृष्ट हुआ। मैं सुबह 4 बजे उठ 
कर 3» नम: शिवाय” इस मन्त्र पर 
ध्यान करने लगी। भक्ति मार्ग में तो 
मैं शिव और शंकर दोनों को एक ही 
मानती थी। एक दिन मुझे लगा कि 
मेरा सूक्ष्म शरीर मेरे अन्दर से निकल 
कर मेरे सामने खड़ा हो गया है। मैं 
देखती रह गई कि मैं दो क्‍यों हो गई 
हूँ। तभी मैंने देखा कि एक अति 
देदिप्यमान बिन्दु सितारा ऊपर की 
ओर उड़ता जा रहा है और मैं भी 
सूक्ष्म काया में उसके पीछे-पीछे उड़ती 
जा रही हूँ। उसके साथ मैं सूक्ष्म वतन 
में जा पहुँची। (उस समय मुझे पता 
नहीं था कि यह सूक्ष्म वतन क्या है) 
वहाँ मैंने जटाधारी शंकर जी को 
देखा। वे ध्यान में बैठे थे। मैंने उनसे 
पूछा कि मैं तो आपका ध्यान करती 
हूँ पर आप किसका ध्यान करते हैं ? 
मुझे कोई उत्तर तो नहीं मिला पर वहाँ 
तुरन्त एक शिवलिंग प्रकट हो गया। 
शिवलिंग में से अनेक रंगों की किरणें 
निकल रही थीं। कुछ क्षण बाद वही 


तेजोमय सितारा मुझे साकार लोक 
में वापस ले आया। 

प्यारे शिव बाबा कहते हैं कि 
सक्षात्कारों से आत्मा का उद्धार नहीं 
हो सकता। कहावत भी है कि 'ज्ञाग 
बिए गत नहीं।' यह गायन नहीं है कि 
(बिन गत नहीं। आत्मा 
का शाश्वत कल्याण तो भगवान द्वारा 
दिए ज्ञान से ही हो सकता है। लेकिन 
आज मैं समझती हूँ कि ज्ञान मिलने 
से बिल्कुल पहले साक्षात्कारों के द्वारा 
प्यारे बाबा ने मुझे बहलाया भी और 
मेरी मानसिक भूमि को ज्ञान-धारणा 
के अनुकूल बनाया भी । साक्षात्कारों 
की कड़ी में सृष्टि के महाविनाश का 
एक भयानक दृश्य मैंने देखा। उस 
दृश्य में पहाड़ के बड़े-बड़े पत्थर हवा 
के एक झौंके से लुढ़क-लुढ़क कर 
नीचे की ओर आ रहे थे। ज्यों ही वे 
धरती पर गिरते थे त्योंहि धरती फटती 
थी और फटी हुई धरती में से गरम- 
गरम ज्वाला निकलती थी और 
देखते-ही-देखते सारी दुनिया को वह 
ज्वाला अपने में लपेट रही थी। यह 
सब देख कर मुझे बहुत डर लगा। मैं 
सोचने लगी कि मैं आगे से ध्यान नहीं 
करूँगी। परन्तु इसमें मेरे करने जैसा 
कुछ नहीं था। यह तो प्रभु की ओर 
से भक्ति का फल मिल रहा था। 
अगले साक्षात्कार में मैंने एक सुन्दर 
बगीचा देखा जिसमें मनोहर फूल थे। 
मेरे हाथ में एक टोकरी थी। मैं जैसे 
ही हाथ बढ़ाती थी वैसे ही, फूल टोकरी 
में भर जाते थे। उन्हें लेने या तोड़ने 


2 कक कक 
सा 5९ 


23 


७७९62 0/608७ छ7न?कूत--+-....+०७७३:७७% 


का पुरुषार्थ नहीं करना पड़ता था। 
तभी मेरे मन में विचार चला कि मैं 
अकेली क्यों हूँ। मैंने चारों और देखा। 
बगीचे के एक कोने में लगभग 2 
वर्षीय, अत्यधिक आकर्षक रूप 
वाला कन्हैया हाथ में बाँसुरी लिए 
दिखाई दिया। उसने मुझे इशारे से 
बुलाया। वह इतना सुंदर था कि क्या 
वर्णन करूँ। भक्ति मार्ग में हम 
गाते थे - 
नवन॑ सुन्दर अधरं सुन्दरस्‌ 
मदुराधिषाति अखिल सुन्दरम्‌ 
उसका अंग-अंग इतना सुन्दर 
'था कि कैसे वर्णन करूँ ? मैं उसको 
देखती हुई जड़वत्‌ खड़ी रही। उसने 
पुनः मुझे इशारे से झूला दिखाया और 
झुलाया भी । फिर मैंने देखा कि अनेक 
गोपियाँ रास कर रही थीं, उस दिव्य 
किशोर ने मुझे भी इशारे से कहा कि 
रास करना है। मैंने अपनी इच्छा 
व्यक्त करते हुए इशारा किया कि 
आपके साथ रास करूँगी। कन्हैया 
और मैं रास करने लगे लेकिन मैंने 
देखा कि हर एक गोपी के साथ एक- 
एक कृष्ण था। कुछ क्षणों का 
अतीन्द्रिय सुख देकर ये दृश्य विलुप्त 
हो गए। एक रात को सोने से पहले 
जब मैंने कमरे की रोशनी बुझाई तो 
अचानक करेरे में दिव्य प्रकाश को 
फैलते देखा। तभी सफेद वस्र धारण 
किए ब्रह्मकुमारी बहनों को और बाद 
में फ़रिश्ता रूप ब्रह्मा बाबा को देखा। 


और न ही प्यारे ब्रह्मा बाबा को | बाबा 
के नयनों में इतनी अधिक कशिश 
(आकर्षण) थी जो मुझे श्री कृष्ण की 
कशिश से भी अधिक लग रही थी। 
उनके नयनों से प्रकाश, शक्ति और 
शान्ति तीनों एक साथ मुझ तक पहुँच 
रहे थे। कुछ क्षण वे मेरे सामने खड़े 
रहे। मैं उन्हें देखती रही। उन्होंने मुझे 
इशारे से कहा - बच्ची, शान्त हो 
जाओ (मैं बहुत तड़फती थी भगवान 
से मिलने के लिए)। आगे कहा - 
बच्ची, मैं जो हूँ, जैसा हूँ, वैसा मेरा 
परिचय, ये सफेद वस्नधारी बहनें 
आएँगी और तुमको देंगी। इस दृश्य 
को देखने के बाद मैं बहुत शान्त हो 
गई, मुझे बहुत सान्त्वना मिली । लेकिन 
यह जानने की तड़फन अभी शेष थी 
कि मैं कौन हूँ और भगवान कौन है। 
मैंने दृढ़ संकल्प किया कि जब तक 
मेरे साथ जो हो रहा है, उसका सही- 
सही पता नहीं चल जाता तब तक मैं 
हर सोमवार मौन में रहूँगी। 

उन दिनों वेदान्ती बहन अफ्रीका 
आई थी। उन्होंने भारत से बहुत सारा 
ईश्वरीय साहित्य जहाज द्वारा 
अफ्रीका मँगवाया था। वो लोग हमारे 
शहर में यह पता करने आए थे कि 
माल पहुँचा या नहीं। वहाँ वेदान्ती 
बहन का दो स्थानों पर भाषण भी 
हुआ। मेरी सास सत्संगों में जाती थी। 
मैं भी जाती थी परन्तु जिस दिन बहन 
जी हमारे शहर में पहुँची और हमारे 


मैं नहीं गई थी। मेरी सास ने आकर 
मुझे बताया कि आज तुम भी सत्संग 
में होती तो अच्छा रहता क्योंकि वहाँ 
पर सफेद वस््रधारी एक बहन आई 
थी। वह कह रही थी कि मैं भगवान 
को जानती हूँ, वह मेरा दोस्त है। हमारा 
वार्तालाप चल ही रहा था कि इतनी 
देर में दरवाजे की घण्टी बजी, सास 
ने दरवाजा खोला और कहा कि वही 
बहन आ गई। मैं आश्चर्य मिश्रित 
आनन्द से भर गई। मैं बाहर की ओर 
भागी और देखते ही मुझे लगा कि 
मैंने इनको पहले देखा है। बहन जी 
हमारे घर, चित्र प्रदर्शनी लगाने के 
लिए सभागार की स्वीकृति लेने आई 
थी। मेरे पति ब्रह्म समाज के अध्यक्ष 
थे, उन्होंने ब्रह्म समाज का सभागार 
देने की स्वीकृति दे दी। लेकिन मेरे 
मन में सवाल उठा कि प्रदर्शनी तो 
साड़ियों की या फूलों की होती है। 
भगवान के लिए प्रदर्शनी कौन-सी 
है। मैंने जब यह प्रश्न पूछा तो बहन 
जी ने प्रदर्शनी के चित्रों की किताब 
निकाली और आत्मा का पाठ समझाने 
लगी। फिर दूसरे चित्र में तीन लोक 
दिखाए सूक्ष्म लोक दिखाया, मुझे 
इतना अच्छा लगा कि यह तो मेरा ही 
अनुभव वर्णन कर रही हैं। फिर 
निराकार ज्योतिस्वरूप परमपिता 
परमात्मा के बारे में समझाया और 
बताया कि ये बिन्दु ही हमारा पिता 
है। ज्योंही उसने बताया त्योंहि मुझे 


उस समय न तो बहनों को पहचाना ख््री सत्संग में भाषण किया उस दिन अन्दर की आँख से एक जगमगाता 


24 


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/७(9-( ९७७ ब्ानाकूल ५७७9 08/0% 


हुआ सितारा दिखने लगा। फिर बहन 
जी उनके गुण गाने लगी कि ये 
निराकार हैं, ज्योतिस्वरूप हैं, कालों 
के काल हैं। मुझे इतना अच्छा लगा, 
इतना अच्छा लगा कि मैंने बहन जी 
को कस कर पकड़ लिया और कहा 
कि आपने बहुत देर लगाई, आप कहाँ 
गई थीं। इतने सालों से मैंने भगवान 
को कितना ढूँढ़ा। आप बहुत देर से 
आईं। बहनजी ने कहा - देर से (लेट) 
तो आई हूँ परन्तु बहुत देर से (टू- 
लेट) नहीं । 

लगभग एक सप्ताह बाद 
वेदान्ती बहन और चन्द्र बहन पुन: 
हमारे घर आईं। उन्होंने बताया कि 
भगवान तो अभी भी आबू पर्वत पर 
दादी हृदयमोहिनी जी के तन में आते 
हैं। मैंने कहा - मुझे अभी-अभी ले 
चलो। बहन जी ने कहा - थोड़ा धीरज 
धरो। मैंने कहा - मेरे से धीरज नहीं 
धरा जाता है। उन्होंने तुरन्त पर्स में 
से दो अँगूठियाँ निकाली जिनके ऊपर 
शिव बाबा का चिन्ह बना हुआ था 
और पूछा कि क्‍या आप दोनों ये 
अँगूठियाँ पहनेंगे ? मैंने कहा - ज़रूर 
पहनेंगे। फिर पूछा कि क्या आपको 
पता है कि अँगूठी पहनने का कया 
अर्थ है। मैंने कहा - मुझे नहीं पता। 
बहनजी ने राजयोग के स्तम्भ वाला 
चित्र निकाला और कहा कि चारों 
स्तम्भ (शुद्ध अन्न, सत्संग, ब्रह्मचर्य, 
दिव्य गुणों की धारणा) पढ़ो। जब 


आपको कुछ पता पड़ा। मैंने कहा 
“नहीं पता पड़ा।' तब बहनजी ने 
ब्रह्मचर्य वाले स्तम्भ पर उँगली रख 
कर कहा कि आप दोनों को इस धारणा 
पर रहना है। मैंने कहा - जरूर रहेंगे, 
भगवान आया है तो ब्रह्मचर्य क्या बड़ी 
बात है। मेरे पति ने भी तुरन्त हाँ कर 
दी। और मुझे ऐसा महसूस हुआ कि 
मैं लोहे की जंजीर में बँधी थी, आज 
मुक्त हो गई हूँ। मैं ऐसे उड़ने लगी 
आकाश में, खुशी में रास करने लगी, 
मेरे पाँव धरती पर नहीं टिक रहे थे, 
मन ही मन में गीत गुनगुना रही 
थी कि - 

(पवित्रता की शक्ति ने 
मुझे आजाद कर विया 
इसके बाद नियमित क्लास शुरू 

हो गई पन्द्रह दिन के बाद बहनजी ने 
कहा - "माताओं को ज्ञान सुनाओ |! 
मैंने कहा - 'मुझे बोलना नहीं आता।' 
परन्तु हिम्मत करके जब संदली पर 
बैठी तो प्यारे बाबा ने मुझे ऐसी शक्ति 
दी, योग का ऐसा रसास्वादन कराया 
जो मैं बहुत सुन्दर तरीके से ज्ञान सुना 
सकी। मुझे खुद भी आश्चर्य लगा 
कि मैं इतना कैसे बोल सकी ? 


जीवन की उपलब्धियाँ जो 
ईश्वरीय ज्ञान से हुईं 


) मैं सदा घर की चारदीवारी के 
अन्दर रहती थी लेकिन बाबा ने मुझे 
आत्मविश्वास के साथ कल्याणकारी 


2) राजयोग के चारों स्तम्भों की 
पालना करने से मेरे अन्दर इतनी 
शक्ति आई कि मेरा शारीरिक 
स्वास्थ्य भी निखर गया। 


3) मैं इतनी निर्भय हो गई कि किसी 
भी संस्थान वा सभा में जाकर बात 
भी करने लगी और ईश्वरीय सन्देश 
भी देने लगी। 


4) इस पुण्य मार्ग पर पाँव रखने का 
फायदा मेरी सन्‍्तान को भी हुआ। 
एक भी पैसा खर्च किए बिना उन्हें 
ब्रिटिश नागरिकता प्राप्त हुई। अपनी 
लगन तथा मेहनत से मेरा बेटा 
वकालत कर गया और दोनों बेटियाँ 
पी.एच.डी . कर गईं। मेरे तीनों बच्चे 
बहुत खुश हैं। अच्छी तरह से जीवन 
में आगे बढ़ रहे हैं। अपने अनुभव से 
मैं कह सकती हूँ कि माता-पिता के 
ज्ञान में चलने से बच्चे भटक नहीं 
जाते बल्कि आगे बढ़ जाते हैं। 


5) मुझे आर्थराइटिस होने के कारण 
मैं शारीरिक भाग-दौड़ नहीं कर 
सकती थी लेकिन राजयोग के 
अभ्यास से इतना स्वस्थ और सशक्त 
महसूस करती हूँ जो सारे विश्व में 
बाबा का सन्देश देते हुए भ्रमण कर 
चुकी हूँ। 

6) मुझमें चिड़चिड़ापन था। 
चिड़चिड़ेपन के कारण मैं चुप हो जाती 
थी और लोगों से किनारा कर लेती 


मैनेपहलिएतो मुझसेपुछाकिक्या बोलगासिखाया।_____ ऑ 


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25 


7+------+०७ ७) ६.२७४७७०------*- ७0७०-७७ कलाकार 


थी, लेकिन बाबा के ज्ञान से गुस्से 
का ये सूक्ष्म रूप भी गायब हो गया। 
अब सम्पर्क-सम्बन्ध में कुछ भी सुनते 
हुए, देखते हुए मुझे अन्दर से रहम 
की भावना आती है। 


7) वाणी में जो थोड़ा अहम्‌ भाव था 
वह भी खत्म हो गया है, बोल में 
मधुरता और नम्रता आ गई है। 


8) हमारा संयुक्त परिवार था। मैंने 
पति के भाई-बहनों को बड़े प्यार से 
खिलाया-पिलाया, पाला था। पहले 
मैं उन्हीं के साथ, उन जैसा सबकुछ 
खा-पी लेती थी लेकिन जब भोजन 
में ईश्वरीय मर्यादाएँ समा गईं तो 
उनको कभी-कभी अच्छा नहीं लगता 
था। पर मेरे प्रेम की शक्ति ने, मौन 
की शक्ति ने, शुभ-भावना की शक्ति 
ने उन सबको बदल दिया। आज सभी 
मुझे प्रेम और आदर की दृष्टि से 
देखते हैं। 


9) मेरी कार्य कुशलता और 
कार्यक्षमता बहुत बढ़ गई। कार 
चलाना, हिसाब-किताब संभालना 
आदि सब काम करने का 
आत्मविश्वास मुझमें आ गया। सबके 
प्रति कल्याण भाव उदित हो गया। 


0) मेरे बच्चे भी मेरे से बहुत प्रसन्‍न 
हैं। ईश्वरीय सेवा में सहयोगी भी हैं। 
लौकिक और अलौकिक में पूरा 
सन्तुलन बना कर चल रही हूँ। है 


26 















है है #व%० ६. है है ॥ वह 
| की । 
शी आ 
आप 


- ब्र.कु. राजकुमारी, मजलिस पार्क, वेहली 


आओ करें हम-तुम शिव बाप को प्रत्यक्ष इस वर्ष 
रखें ओना, रहे वंचित न कोई कोना, गूँजे सारा आर्श , 
क्योंकि आ गया है परमात्म प्रत्यक्षता वर्ष।। 


है आत्मविभोर साधक! हो जाओ परमात्म विभोर सहर्ष , 
समझो न! है निहित इसी में सच्ची शान्ति, सुख व उत्कर्ष, 
हो जाए भोर हर ओर, न रहे कहीं तनिक भी अंधियारा, 
न छूटे कोई मन, कोई घर, कोई गली और गलियाय। 
यत्र-तत्र-सर्वत्र गूँजे 'ओम शान्ति” का नारा, 
होगी इसी से आध्यात्मिक एकता, इसी से विश्व उजियारा। 
देना है सन्देश यही, न रहे दूर, कोई मगरूर, 
छा जाए हर नयन में , परमात्म सरूर जुरूर। 
ओ शिव सन्देशी! ऐसा करें विशाल जन्‌-सम्पर्क, 
क्योंकि आ गया है परमात्म प्रत्यक्षता वर्ष।। 


आखिर कब तलक रहेंगे दुःख घनेरे, 
इन्द्र मेरे-तेरे, दिखावी रिश्ते और कपट 

हो के रहेगा अति का अन्त, निपटेंगे ही झमेले सारे और कष्ट, 
कसके रोके रुकेगा स्वर्णिम सवेरा, बरसेगा हर ओर आत्मिक हर्ष, 
क्योंकि आ गया है परमात्म प्रत्यक्षता वर्ष।। 


ओ अभिनेता या प्रणेता! ओ विधि-विधानवेत्ता उत्कृष्ट , 
हो विद्वान या नादान, जनसाधारण, वृद्ध या नवागत बालवुन्द , 
दिग-दिगन्तर के ओ प्रहरी! ओ रक्षक सेनानी सर्व समर्थ, 
अब होने अख-शख निरस्त! पड़ने लगे सपने धूमिल, 
सुनो! परमात्म अवत्रण हुआ धरा पर, देरन कर आ मिल, 
हो जाएँ अब मन्मनाभव, नष्टोमोहा और स्मृतिलब्ध,, 
“ओम शान्ति' है आदि, जता दो सबको, ओम शान्ति है निष्कर्ष , 
आओ करें हम तुम शिव बाप को प्रत्यक्ष इस वर्ष , 
क्योंकि आ गया है परमात्म प्रत्यक्षता वर्ष।। #+# 















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कै 
32 हल्‍-" ««- ब्लूूट्तत कष्ट अमन 
2 ६ 


कप रतीय जीवनदर्शन में 
 ” ” लौकिक या पारलौकिक 
सुख का आधार है संस्कृति अर्थात्‌ 
सुन्दर कृति | यूँ तो संस्कृति, संस्कृत, 
संस्कार ये सभी मिश्रित शब्द हैं। 
संस्कार आत्मा की मौलिक शक्ति 
है। इसके मुख्यतः दो प्रकार हैं। श्रेष्ठ 
और बुरे संस्कार । श्रेष्ठ संस्कारों द्वारा 
दया, प्रेम, सहयोग और सदभावपूर्ण 
कार्यों से सर्वत्र एकता का भाव 
स्थापित होता है। वह संस्कृति का 
रूप हो जाता है। संस्कार कर्म का 
गुप्त बीज है और संस्कृति प्रत्यक्ष 
कर्म है। इसलिए भारत में जन्म से 
मृत्यु तक संस्कार करने की 
पद्धति है। 
भारतीय संस्कृति इस धरा की 
मुकुटमणि है। यहाँ रामराज्य था तो 
प्रवृत्ति अति सुन्दर, मनोरम, 
सतोप्रधान थी और संस्कृति सर्व 
कलाओं से सम्पन्न देव संस्कृति थी। 
देवालयों में आज भी उस श्रेष्ठ 
संस्कृति की पूजा-अर्चना की जाती 
है। शास्रों में इसका वर्णन किया गया 
है। द्वापरयुग के बाद इस महासंस्कृति 
को सँवारने व सुरक्षित करने में ऋषि- 
मुनियों का त्याग-तपस्या और उच्च 
विचारों के रूप में योगदान रहा है। 


वर्ष 39 अंक ] / मई 2004 


पी 25 5:. पोज ली 
हम 'ह्रू१ श्र. कंग्ः शु 
है €१ ९४५ हुँ को. # ॥ है 


- _ ब्र.कु. विनोद, आबू पर्वत 


विश्व के अनेक राष्ट्रों की 
संस्कृति का स्रोत भारत ही है और 
मैक्समूलर ने तो कहा है - “वेद की 
समानता में विश्व साहित्य ने अब 
तक कुछ भी नहीं दिया।'” फ्रांसिसी 
दार्शनिक वाल्टेयर ने जब ऋग्वेद को 
देखा तो वह आश्चर्य से चिल्ला उठा 
- “केवल, इसी देन के लिए पश्चिम 
पूर्व का सदा ऋणी रहेगा।”” लुईस 
जकोलिएट, अपनी पुस्तक वायबल 
इन इण्डिया' में लिखते हैं '“मनुस्मृति 
वह नींव है जिस पर इजिप्टियन, 
परशियन, ग्रीक और रोमन न्याय व 
नियमों का स्तम्भ खड़ा है।'' 

आज के बदलते परिवेश में 
प्राकृतिक संसाधनों की भाँति मानव 
संस्कृति भी प्रदूषित हो गई है। वह 
देश-स्थान-धर्म-सम्प्रदायों में विभक्त 
हो विकृत व प्राणहीन हिन्दू संस्कृति, 
इस्लामी संस्कृति, बौद्ध संस्कृति व 
भौतिक संस्कृति के रूप से पहचानी 
जाती है। उपभोक्‍्तावादी संस्कृति एवं 
धार्मिक आस्थाओं को खण्डित करने 
वाले मनमोहक लुभावने बाजारवाद 
के बढ़ते प्रभाव और हिंसक वृत्तियों 
के कड़े प्रवाह से मानवीय मूल्यों का 
पतन तीब्रगति से हो रहा है। यह सर्व 
समस्याओं का कारण है। इस छिन्‍्न- 


भिन्‍न संस्कृति को सुरक्षित व 
सुविकसित करना हमारा उत्तरदायित्व 
है। अत: अब हम शालीनता में रहें, 
स्वयं के संकल्पों, विचारों, भावनाओं 
एवं कर्मों को श्रेष्ठ बनायें । सामाजिक 
सद्भाव एवं सहयोग हेतु आत्मिक 
भाव को जागृत करें। सर्वगुणों, 
कलाओं का विकास कर सम्पूर्ण 
चरित्रवान बनें। ताकि स्वर्णिम युग 
के सुप्रभात में विश्व क्षितिज पर 
भारतीय सुसंस्कृति की श्रेष्ठता का 
ध्वज लहराने लगे। 

संक्रीर्णताओं को त्याग सांस्कृतिक 
समन्वय बनाएँ - विविध मत- 
मतान्तरों, धर्म-सम्प्रदायों के बीच 
हमारा जीवन संघर्षमय होता जा रहा 
है। स्वयं की संकीर्ण भावनाएँ 
देहाभिमानी बनाती हैं। एकछत्र राज्य 
करने के प्रयास में हम दु:खों- 
समस्याओं को आमंत्रण देते हैं। अत: 
संकीर्ण वृत्तियों से ऊपर उठें, सबके 
साथ समन्वय स्थापित करना सीखें। 
हम किसी का प्रतिकार करके कदापि 
सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित नहीं 
कर सकते। हम अपने दायित्व पूर्ति 
के लिए मानवीय भावनाओं का आदर 
करें और आत्मिक भाव से 
नैतिकतापूर्ण आचार-व्यवहार करें। 


४2% 





शालीनता से सबका सहयोगी बन 
प्रशंसा करें। 

स्वतन्त्र रहें किन्तु स्वच्छन्द न बनें 
- प्रत्येक व्यक्ति स्वतन्त्र रहना चाहता 
है और यह नैतिक अधिकार अनिवार्य 
भी है क्योंकि जीवन का सम्पूर्ण 
विकास सम्पूर्ण स्वतन्त्रता में ही सम्भव 
है। सम्पूर्ण स्वतन््रता अर्थात्‌ स्वयं को 
शारीरिक-मानसिक विकृतियों से 
मुक्त कर लेना। अतः हमें स्वतन्त्र 
होकर सर्व को स्वतन्त्र कराना चाहिए 
नैतिक मूल्यों एवं नियम-मर्यादाओं 
का उल्लंघन कर स्वार्थ पूर्ति हेतु कुछ 
भी करने को उद्यत होना, अपनी पद- 
प्रतिष्ठा की ओट में स्वतन्त्रता का 
सहारा ले दूसरों को अनैतिक कार्यों 
के लिए विवश करना, मानवीय 
संरक्षण से वंचित करना तो 
स्वच्छन्दता है, इससे बचें। 
आत्मसंयम से सांस्कृतिक मूल्यों 
का संरक्षण करें - बढ़ता भौतिक 
साधनों का आकर्षण, व्यवसायिक 
स्पर्धा, पारिवारिक बोझ, बेरोज़गारी, 
प्राकृतिक प्रदूषण और भ्रष्टाचार आदि 
से जैसे कि व्यक्ति का सुरक्षित जीवन 
जीने का अधिकार ही नहीं रहा है। 
व्यवहार जगत में बहुतों को छल- 
कपट व काले धन्धे से मालामाल होते 
देख आम आदमी उलझन में पड़ जाता 
है। वह सोचने लगता है कि यहाँ सत्य 
एवं ईमानदारी से तो जीना ही दुर्लभ 


26 


७968+67₹/९)069७ बजानानमूत 


है। इस तरह वह संयम का बाँध तोड़, 
संगदोष से अभिशप्त हो, स्वार्थपूर्ति 
हेतु नेतिक मूल्यों, इरादों, कर्तव्यों, 
सिद्धान्तों से नीचे गिर जाता है। इस 
प्रकार, धन-सम्पत्ति, नाम-मान 
बेशुमार हासिल कर लेने के बाद भी 
ईश्वरीय कृपा, आत्मिक सुख और 
संतोष की दृष्टि से कंगाल ही रह जाता 
है। संयम में जीवन का सुख एवं 
सदगुणों का विकास निहित है। जिन 
पर सामाजिक विकास का दायित्व 
है वे अनैतिक कार्यों में सहभागी न 
बनें। पतनोन्मुख आदतों को पोषित 
न होने दें। वे संयमित रह कर श्रेष्ठ 
भावनाओं, शुभविचारों का प्रकम्पन 
फैलाएँ और अपने आचार-विचार से 
औरों को संयमित कर सांस्कृतिक 
मूल्यों की रक्षा करें। 

अपसंस्कृति के विध्व॑सकारी 
दुष्परिणाम से बचें - पिछले कुछ 
वर्षो में मानव, प्रगति के द्वार से, पतन 
की उल्टी धारा में बह गया है जिसका 
दुष्प्रभाव दु:ख, दरिद्रता सहित 
लाइलाज बिमारियों के रूप में सामने 
आरहा है। नि:संदेह एड्स का भयावह 
संक्रमण जिस तरह से पूरी दुनिया में 
फैल रहा है इससे पूरा मानवीय 
अस्तित्व खतरे में है। अमर्यादित 
जीवनशैली, यौनशोषण, वेश्यावृत्ति 
एड्स के मुख्य संवाहक हैं। इनसे 
प्रतिदिन दस हज़ार लोग मृत्यु की 





गोद में सो जाते हैं। एक आँकड़े के 
अनुसार दक्षिण अफ्रिका के बाद 
भारत में इस महामारी का सबसे 
ज्यादा प्रभाव है। यहाँ पचास लाख 
लोग इससे संघर्षरत हैं। क्या इससे 
बचना सम्भव है? हाँ सम्भव है, 
संयमित, मर्यादित जीवन के द्वारा। 

स्वामी विवेकानन्द जी ने कहा 
है - “यह वही भूमि है जहाँ से दर्शन 
और आत्मज्ञान की ऊँची लहरों ने 
बार-बार उठ कर समस्त विश्व को 
पलल्‍लवित कर दिया था और यह भारत 
वही भूमि है जहाँ से एक बार पुन: 
उस ज्वार-भाटे केढ उठने की 
आवश्यकता है जो पतनोन्मुख 
मानवता को नव-जीवन और शक्ति 
दे सके ।”” निःसंदेह सम्पूर्ण मानव का 
उत्थान केन्द्र भारत ही है। वर्तमान 
समय यहाँ नवयुग निर्माण हेतु राजयोग 
की श्रेष्ठ साधना द्वारा संस्कार 
शुद्धिकरण का कार्य चल रहा है। 
स्वयं निराकार परमपिता परमात्मा 
अब दैवी संस्कृति के उत्थान हेतु 
मानवात्माओं को श्रीमत, पालना, 
प्यार एवं सर्वशक्तियाँ देकर, 
पवित्रता, स्वच्छता से भरपूर, 
साधनामय जीवन की अनुपम सौगात 
दे रहे हैं। इसी से देवी युग के दैवी 
मानव और दैवी संस्वृतृति का 
सूत्रपात होगा। 


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वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


समस्या 


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5 
श्वरीय मार्ग पर पाँव रखते 
ही मुझे परमात्मा पिता से 
हिम्मत का वरदान मिला। समय के 
घूमते चक्र के साथ-साथ इस वरदान 
ने कदम-कदम पर साथ दिया और 
सफलता का सेहरा पहनाया। मेरा 
लौकिक जन्म एक गाँव में हुआ परन्तु 
पिता जी व्यापार-व्यवसाय से जुड़े 
थे तो बचपन सुख-सुविधाओं के बीच 
गुज़रा। तीन बहनों का अकेला भाई 
होने के कारण मुझे माता-पिता का 
विशेष स्नेह मिला। जीवन के 8वें 
वर्ष में मैंने देखा कि पिता जी का 
व्यवसाय पूर्णतया बर्बाद हो गया 
जिसका कुप्रभाव मेरी पढ़ाई पर हुआ। 
पढ़ाई छूट गई । मुझे पिता जी के साथ 
एक नये कार्य में मदद देनी पड़ी। 
नौकरी बेह लिए भी 20-25 
किलोमीटर तक साइकिल पर जाना 
पड़ता था परन्तु हिम्मत का सुखदाई 
फल निकला और आर्थिक समस्या 
का समाधान हुआ। इसके बाद मुझे 
हरियाणा बैरियर पर लिपिक का कार्य 
मिला। वहाँ मेरे मन में धन का 
आकर्षण बढ़ने लगा और मैं अनैतिक 
धन कमाने लगा। यह अनैतिक धन 
अपने साथ कई बुराइयों को भी मेरे 


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जीवन में ले आया धूम्रपान, मद्यपान 
ने जीवन को घेर लिया। अनैतिक 
कार्य और व्यसन मन को तनावग्रस्त 
करते हैं, शान्ति छीन लेते हैं, संसार 
से और कर्त्तव्यों से पलायन करना 
सिखाते हैं। मैं भी इनका भुक्तभोगी 

बना और एक दिन जब मेरा लौकिक 
जन्मदिन था तो तनाव वश मैं घर से 
निकल गया। अब हालांकि मैं आर्थिक 
रूप से सम्पन्न था फिर भी सुख- 

शान्ति के लिए तरस रहा था। मन में 

व्यर्थ विचारों का बवंडर मचने लगा। 

मेरे पूर्व के पुण्यों ने ऐसे विपरीत समय 
पर मेरी सहायता की। मेरे एक 
शुभचिन्तक ने उस हालत में मुझे देखा 
और कहा कि आपके जीवन से तनाव 
को मिटाने का रास्ता मेरे पास है, 

आप ब्रह्माकुमारी सेवाकेन्द्र पर चलो। 

मैंने उसे टालने के लक्ष्य से कहा कि 
कल चलेंगे, आज नहीं | वह भाई मुझे 
अपने घर ले गया और सुन्दर दिव्य 
गीतों की कैसेट मेरे आगे चालू कर 
दी। पहले गीत ने ही मेरे दिल को छू 
लिया। गीत था - “करते चलो सबका 
भला जीवन के जीने की ये है कला 
...' मैंने उसी समय आश्रम चलने 
का मन बना लिया और इस तरह 


कं 





० छा ध 


 - ब्र.कु. ज्योति, बललबगढ़ 


मेरा लौकिक जन्मदिन ही मेरा 
अलौकिक जन्मदिन बन गया। 
आश्रम का वातावरण, वहाँ की 
स्वच्छता और शान्ति एवं दैवी बहनों 
के निःस्वार्थ प्रेम ने मेरा मन मोह 
लिया। उन्होंने मुझे आत्मा के विषय 
में समझाया तभी मैंने संकल्प कर 
लिया कि जीवन भर व्यसनों से मुक्त 
रहूँगा। राजयोग के अभ्यास से मेरा 
मन सुख और गहन शान्ति से भरपूर 
हो गया। ईश्वरीय ज्ञान की मुरली 
सुनी तो मन-बुद्धि ने सम्पूर्ण रीति से 
यह स्वीकार कर लिया कि यह ज्ञान- 
योग किसी गुरु-गुसाईं आदि का नहीं 
बल्कि स्वयं भाग्यविधाता, वरदाता, 
सर्वशक्तिमान का दिया हुआ है 
जिसके लिए ही गायन है कि अगर 
उसकी नज़र पत्थर पर भी पड़ जाये 
तो वो भी पारस बन जाता है। और 
यही हुआ भी व्यसनों को छोड़ने में 
मनुष्यों को अक्सर कष्ट होता है परन्तु 
परमात्मा पिता की प्रथम पहचान 
मिलते ही सभी व्यसन मेरे जीवन से 
ऐसे चले गए मानो थे ही नहीं। पवित्रता 
जीवन का लक्ष्य बन गयी और प्रतिज्ञा 
कर ली बाबा से - 'बलिहार यह 
जीवन आप पर, जैसे चलाओ, अब 





वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


29 


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तो जीवन की नैया आपके हवाले।' 

अब वो घड़ी आ गई जिसको 
ऋषि-मुनि हज़ारों साल तपस्या करके 
भी नहीं पाते अर्थात्‌ प्रभु मिलन की 
घड़ी। मैं अव्यक्त बापदादा से मिलने 
मधुबन आया। प्यारे पिता शिव 
परमात्मा से मधुर मिलन से मेरी जन्म- 
जन्म की प्यास बुझ गई। शिव बाबा 
की दृष्टि ने मुझे मालामाल कर दिया। 
जन्म-जन्म भटके हों जिसके लिए, 
मिल जाए वह, तो यही गीत निकलता 
है दिल से 'पाना था सो पा लिया बाकि 
और क्‍या रहा।' अब आत्मा में एक 
नई शक्ति का संचार हुआ। नये लक्ष्य 
के लिए नई पढ़ाई शुरू हुई तो नई 
परीक्षा भी आई। घर पहुँचते ही मैंने 
पाया कि पिता जी अचानक सख्त 
बीमार हुए और बहुत ईलाज कराने 
के बावजूद उनका देहान्त हो गया। 
परिवार की सारी जिम्मेवारी बड़ा होने 
के नाते मेरे पर आ गई। कर्ज़ा सिर 
पर बहुत था, नौकरी भी छोड़नी पड़ी 
पर हिम्मत है तो बाप सदा साथ है 
ही। सर्वशक्तिमान को साथ रख मैंने 
एक छोटी-सी चाय की दुकान खोली 
जिस पर मैं चाय या भोजन जो भी 
बनाता, शिव बाबा की याद में बनाता। 
शुरू में थोड़ा संघर्ष करना पड़ा परन्तु 
बाद में वही दुकान इतनी चली कि 
मुझे बिल्कुल फुर्सत नहीं मिलती थी। 
मेहनत पूरी करनी पड़ती थी परन्तु 


30 


आर्थिक स्थिति फिर ठीक हो गई। 
शुक्रिया शिव बाबा का। शुरू के 6 
महीने तो मैं दुकान चलाने के साथ- 
साथ रात की पारी में छोटी-सी नौकरी 
भी करता रहा। इसके बाद मुझे एक 
अच्छी नौकरी मिली और पुरुषार्थ तथा 
ईश्वरीय सेवा का पूरा समय मिलने 
लगा। जीवन ज्योंहि स्थिर होने लगा 
परीक्षा की एक नई लहर पुन: हलचल 
मचाने आ गई। जैसे मूर्तिकार एक 
बेजान पत्थर को काट-काट कर 
पूजनीय मूर्ति बनाता है जिसका पता 
उस पत्थर को भी नहीं होता और न 
देखने वालों को कि एक दिन इस 
पत्थर से इतनी सुन्दर मूर्ति निकलेगी। 
मूर्ति के दर्शनों के लिए भक्तों की 
लाइन लगती है परन्तु यदि पत्थर 
अपनी काट-छाँट से इन्कार कर दे 
तो वह उन बेजान पत्थरों में ही पड़ा 
रहता है जिन्हें लोग पैरों तले 
रोंदते हैं। 

ये सब विचार मेरे मन में थे तो 
आया हुआ कष्ट, कष्ट न लगा। हुआ 
यूँ कि मैं ईश्वरीय सेवा करके स्कूटर 
द्वारा आ रहा था कि अचानक एक 
भाई के आगे आने से दुर्घटना हो गई। 
स्कूटर लगभग 60-70 कि.मी, प्रति 
घण्टे की गति में था। मैं मुँह के बल 
सड़क पर गिर गया, नाक से खून 
आने लगा। अस्पताल पहुँचने पर 
एक्सरे, सी.टी. स्केन हुआ जिसमें 


मालूम पड़ा कि नाक के बायीं तरफ 
कम्पाउण्ड फ्रैक्चर है और कान के 
पास भी फ्रैक्चर है। सर्जन ने मुझे 
कहा कि आपका ऑपरेशन होगा। 
मैंने उस समय ऑपरेशन से इन्कार 
कर दिया, मैं किसी दूसरे सर्जन से 
सलाह लेना चाहता था। दूसरे सर्जन 
ने भी कहा कि ऑपरेशन होगा और 
दाँतों का जबड़ा भी हिल गया है जिसे 
दो मास के लिए तारों से बाँधा जाएगा। 
अब मैं मन-ही-मन सुप्रीम सर्जन शिव 
बाबा से बात करने लगा कि इस जन्म 
में तो मैंने ऐसे कर्म नहीं किये जो मेरे 
शरीर के साथ ऐसी चीर-फाड़ होगी। 
इसके बाद एक ऑरल सर्जन को 
दिखाया तो वे बोले कि आप फिक्र 
न करें, सर्जरी तो होगी लेकिन आपको 
मालूम भी न चलेगा। उन्होंने कहा 
कि दाँतों पर शिकंजा भी नहीं लगेगा। 
उन्होंने इनटर्नल सर्जरी की और अगले 
दिन छुट्टी दे दी। कमाल बाबा की 
जो मैं अगले दस दिनों में बिल्कुल 
ही ठीक हो गया। मुझे मालूम ही नहीं 
हुआ कि कैसे सर्जरी हुई है और कैसे 
हड्डी को एक छोटी स्टील की प्लेट 
से सैट कर दिया गया है। अब में पूरी 
तरह स्वस्थ हूँ। कितने अनुभवों का 
वर्णन करूँ, हर कदम पर नये-नये 
अनुभव होते रहते हैं। मैं आत्मा तो 
बेजान पत्थर समान थी परन्तु मूर्तिकार 
शिव बाबा ने ही इसे तराशना शुरू 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 


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कर दिया और दिव्यता में ढाल दिया। अआमशीवदि वही कीमत 

वाह रे भाग्य, जो शिव बाबा 

पारसनाथ ने मुझ पत्थर बुद्धि को - ब्र.कु. नरेन्द्र, कायावरोहण (गुजरात) 
पारस बुद्धि बना दिया। अब मेरा य त॑मान युग में अनेक मानव इस प्रश्न में उलझे हुए मिलेंगे कि ईश्वर 
जीवन पूर्णतया शिव बाबा की सेवा पिता के नजदीक जाने और उनसे वरदान प्राप्त करने की प्रबल इच्छा 
में या कहो कि भारत को स्वर्ग बनाने | ऐतें हुए भी न जाने क्यों उनके पाँव पीछे हट जाते हैं, अध्यात्म की शीतल फुहार 
की की समर्पित है। ईश्वरीय ज्ञान के बजाए सांसारिक गर्म थपेड़े उन्हें क्यों आकर्षित करते हैं, प्रेम और शान्ति के 


स्वच्छ झरने को छोड़ कर वे शंका और कुशंका के गन्दे नाले में क्यों गिर जाते 
हैं? इन सब प्रश्नों का उत्तर महात्मा बुद्ध के जीवन से जुड़ी एक घटना से मिल 
जाता है। कहते हैं कि एक बार एक नगरसेठ ने उन्हें भिक्षा के लिए निमन्त्रण 
दिया। महात्मा बुद्ध ने निमन्त्रण स्वीकार कर लिया। सेठ जी का मन तो बल्लियों 
उछलने लगा कि मुझे भिक्षा के बदले ढेरों आशीर्वाद और दुआएँ मिलेंगी। 
निश्चित समय पर महात्मा बुद्ध उनके द्वार पर पहुँचे। नगरसेठ दौड़े-दौड़े 
गए और अन्दर से खीर भरा पात्र लाए। पर ज्योंहि महाभिक्षु के पात्र में उड़ेलने 
लगे तो एकदम रुक गए क्‍योंकि भिक्षा-पात्र कीचड़ से भरा था। सेठ जी को 
थोड़ा विचित्र लगा परन्तु मौके की महानता को ध्यान में रख कर वे बिना बोले 
पात्र को साफ करने में लग गए और स्वच्छ भिक्षा-पात्र में खीर डाल कर, 
महात्मा जी के हाथ में देकर आशीर्वाद की कामना से हाथ जोड़ कर, सिर झुका 
कर उनके सामने खड़े हो गए। महात्मा बुद्ध शान्त मुद्रा में खड़े उसे निहारते रहे। 
उनका मौन नहीं टूटा, आशीर्वादों की झड़ी नहीं लगी। सेठजी का धैर्य-बाँध टूट 
गया। उन्होंने कातर स्वर में कहा - “महाराज, आशीर्वाद से कृतार्थ कीजिए।'' 
महात्मा जी तो जैसे इसी क्षण के इन्तजार में थे। उन्होंने ओजस्वी वाणी में धीरे- 
धीरे कहना प्रारम्भ किया - “हे नगर सेठ, जिस प्रकार भिक्षा लेने से पहले 
भिक्षा-पात्र का स्वच्छ होना जरूरी है, इसी प्रकार, कीमती आशीर्वाद ग्रहण 
करने से पहले मन-बुद्धि रूपी पात्र का स्वच्छ होना भी जरूरी है। आपने कीचड़ 
से भरे पात्र के ऊपर खीर नहीं डाली क्योंकि आपको ख्याल था कि खीर व्यर्थ 
हो जाएगी। खीर की कीमत तो कुछ पैसे मात्र ही है परन्तु मेरे आशीर्वाद तो 
अमूल्य हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार और छल-कपट से भरे मन-बुद्धि 
रूपी पात्र पर कीमती आशीर्वाद ठहरते ही नहीं। इसलिए आप भी पहले मन- 
बुद्धि को स्वच्छ कीजिए। काम की जगह आत्मिक स्नेह, क्रोध की जगह क्षमा, 
लोभ की जगह सन्‍्तोष, मोह की जगह वैश्विक प्रेम और अहंकार की जगह 
नग्नता भरिए। छल-कपट के स्थान पर सरलचित्त बन जाइये, फिर अमृत तुल्य 
आशीर्वाद स्वत : तुम्हारी निजी सम्पदा बन जायेंगे, बिना माँगे भी मिल जायेंगे।'' 
नगर सेठ को, सचमुच, आत्म-विश्लेषण का बहुत सुन्दर मन्त्र महात्मा जी से 
मिल गया जिसने उसके जीवन को अच्छाई की ओर मोड़ दिया। कप 


तथा राजयोग के बल से आत्मा इतनी 
शक्तिशाली बन गई है कि मेरा 
लौकिक परिवार, सम्बन्ध-सम्पर्क में 
आने वाले सभी भाई-बहनें मुझसे 
सन्तुष्ट रहते हैं। मुझे आज तक किसी 
से कोई शिकायत नहीं है। राजयोग 
के निरन्तर अभ्यास से मेरी स्मरण 
शक्ति बहुत ही शक्तिशाली हो गई 
है, में अपनी कम्पनी में एक उदाहरण 
बन गया हूँ। 

मेरे इन सब परिवर्तनों को देख 
मेरे परिवार के अन्य सदस्य भी शिव 
परमात्मा के बच्चे बन गए हैं। वे 
नियमित ज्ञान-योग में लगनशील हैं। 
अब मुझे अपना घर स्वर्ग जैसा लगता 
है जहाँ सुख-शान्ति प्रत्येक आने वाले 
बहन-भाई को अनुभव होती है। मेरा 
अनुभव यही है कि संघर्ष से कभी 
घबराना नहीं चाहिए बल्कि हिम्मत 
से आगे बढ़ना चाहिए। एक परमात्मा 
बाप पर पूरा निश्चय रख उसकी 
श्रीमत पर चलते रहना चाहिए। इससे 
मीठे बाबा की पूरी मदद मिलती है 
और सफलता आखिर हमारे गले का 
हार बन जाती है। #% 


वर्ष 39 अंक ]] / मई 2004 3] 


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हर ७, जिद 


जड़ मी | हु 
व आओ 
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म सभी जीवन-यात्रा के 

छह मुसाफिर हैं। यह जीवन-यात्रा 
एक पड़ाव है, मंजिल नहीं। आगे और 
भी चलना है। आँधियों, तूफानों से लड़ 
कर विजयी होकर चलना है। हम देखते 
हैं कि प्रकृति का कण-कण देने का, 
खुश रहने का, अथक बनने का, गुनगुनाने 
का और निर्विकार बनने का सन्देश देता 
है। हम देखते हैं कि सूर्य उदित होकर 
संसार को अपनी सुनहली किरणों में स्नान 
करा देता है। शीतल-सुरभित हवा मन्द- 
मन्द बहती मस्ती बिखेरती है। पक्षीवृन्द 
रस से सराबोर गीत गाकर परमपिता 
की उत्कृष्ट सृजन-कला का वर्णन- 
विवरण-निरूपण सुनाते हैं। सरिताएँ 
कल-कल करतीं लहरियों के नूपुर 
झंकारती हुई बढ़ती जाती हैं और पुष्पों 
पर गुंजारित मदमाते भ्रमर आनन्द के 
राग गाते हैं। इस प्रकार, पृथ्वी का अणु- 
अणु, कण-कण समृद्धि, प्रेम, सुख, 
एकता, आनन्द को प्रवाहित करते हुए 
हमें सदा प्रसन्‍न रहने का संदेश दे रहा 
है। प्रसन्‍न रहने से हृदय-कमल खिला 
रहता है। मुखाकृति पर उल्लास-उत्साह- 
उमंग दिखता है। मन प्रेममय, स्वच्छ, 
निश्छल, भार-रहित एवं पवित्र बनता 
है। दिव्य सामर्थ्य विकसित होते हैं। 
इसलिए कहा गया है कि खुश रहिए 
मुस्कराते रहिए। यह मुस्कराहट 
आन्तरिक संस्थानों को उत्फुल्ल करेगी, 
स्फूर्ति एवं ताजगी से भरेगी, कार्य में 


अ्ममिकल पक. 
साफिर 


» - ब्रे.कु. डॉ. इन्द्रदत्त पाण्डेय, बलिया 


मन लगेगा, शरीर का स्वास्थ्य भी उत्तम 
रहेगा। मन की प्रसन्नता का उत्तम प्रभाव 
कर्मेन्द्रियों पर भी पड़ता है। धीरे-धीरे 
मुस्कराहट स्थायी रूप से जैसे स्वभाव 
का अभिन्न अंग बन जाती है। हर्षितमुख 
व्यक्ति का सर्वत्र स्वागत होता है। कहा 
भी है कि हँसो तो संसार साथ में हँसेगा, 
रोओ तो अकेले रोते रहो। मुस्कराते 
रहने से शरीर के आन्तरिक अवयवों 
तथा माँसपेशियों का व्यायाम होता है, 
थकावट दूर हो सहज स्फूर्ति प्राप्त होती 
है। मुस्कराहट प्रभु द्वारा मनुष्य जाति 
को मिला एक अमूल्य वरदान है। पर 
हमारी मुस्कराहट निर्दोष, निष्कपट, 
व्यंग्य रहित हो। हास्यभाव पवित्र हो। 
यदि हमारे जीवन-आकाश में काले और 
श्वेत दो बादल दिखें तो हम श्वेत बादल 
को देख कर तो मुस्कराएँ ही, दुःख के 
काले बादलों को देख कर भी मुस्कराएँ 
कि यह बरसेगा तो बरसे क्योंकि हमको 
ज्ञान है कि सारी सृष्टि तो एक नाटक है 
जिसकी पुनरावृत्ति हो रही है। नाटक सही, 
हू-ब-हू, यथार्थ रूप से वही चल रहा है 
जो कल्प पहले चला था। पिछली बार 
भी तो हमने यह सब देखा-परखा-झेला 
है। जो हुआ है, वह हो रहा है। बनी बनाई 
बन रही है। परमपिता मेरे साथ हैं। वे 
तो ज्ञान-सागर, सुख-सागर एवं आनन्द- 
सागर हैं, वे ज्ञान-सुख-आनन्द की वर्षा 
कर रहे हैं, हमारा तृतीय नेत्र खुला है। 
हम प्रभु के अनुग्रह से वंचित क्यों रहें। 


स्वयं परमपिता हमें ज्ञान दे रहे हैं। सृष्टि 
चक्र बता रहे हैं, वे तो मेरे ही साथ हैं। 
हम दैवी संबंध से प्रसन्न हैं। प्रभु की 
आत्मीयता एवं समीपता का निरन्तर 
अनुभव कर विकर्मातीत एवं देहातीत 
हे रहे हैं। हमारी दृष्टि, वृत्ति, कृत्ति, सृष्टि 
में एक विशेष मधुरता है। हम उन्हीं की 
स्नेहमयी छत्रछाया में हैं। माया की छाया 
हमें छू नहीं सकती। अगर-मगर छोड़ 
कर हमने उन्हीं की डगर पकड़ी है। उनके 
हथों में मेरा हाथ है। वे जहाँ ले जाएँ, 
जैसे रखें। ऐसी खुशी मुझे बाबा के 
दरबार में मिली है कि मेरा मन गा उठता 
है - खुशी मेरे दर से कहाँ जाएगी। यहाँ 
शान्ति की शक्ति, मधुरता का रस, 
निर्भयता का रक्षा-कवच, धैर्य का किला, 
निश्चिन्तता की सुरभि, सन्तुष्टता का 
तख्त, सर्व प्राप्तियों के अविनाशी रत्न, 
त्याग का श्रृंगार एवं पवित्रता का ताज 
पाकर हमने स्वराज्य पा लिया है। हम 
यहाँ पूज्य-पूर्वज आत्मा की स्मृति में 
टिके हैं। अब हम प्रसाद में जीयेंगे, 
अवसाद में नहीं, प्रसन्‍न रहेंगे, अवसन्न 
(उदास) नहीं। हमारे जीवन में सर्वत्र हर्ष 
है, विषाद कहीं नहीं। जीवन की दीप- 
शिखा सजीवता से प्रकाशमान है क्योंकि 
दीपक में प्रसन्‍नता एवं आशा का तेल 
भरा है, स्निग्धता भरी है। झूठी आशा 
नहीं, प्रवंचना की आशा नहीं, इतराने 
वाली आशा नहीं, सच्ची गतिशील आशा 
है। इसलिए मैं अपने को कहता हूँ - 

पंथ पर चलना तुझे 

तू मुस्करा कर चल मुसाफिर | 
जिन्दगी की राह में केवल 
वही पंथी सफल है, 
आँधियों में, बिजलियों में जो रहे 
अविरल मुसाफिर। 


नपपपपप्प्प्पपपपपप्प्प््िा:िाहपथाथ:थथझथझथमभभपहतपमक्‍इक्‍््फक्‍पि ्पभक्‍क्‍हफाजभ":भऊभभझपपाभ/थ:थ:थमहमपैहपभआिक्‍फ डझहभ/फ»हैभहफक्‍/ए/ए"+//कफऊअफ्पुफभमभपभफतप:;,»“ आ।:पऊ १]्)स्‍़़गाजाऊफ।िऊ.्् 


_- >-ञं,कु, आत्मप्रकाश, सम्पादक 


आबू रोड में प्रजापिता अधाकमार्ी वसैय 


ऋ्याओं। : $॥99099॥()0॥.९0॥.6९ 


भवन, शान्तिवन 
विश्व विलय नी 


रोड द्वारा सम्पादन तथा ओमशान्ति प्रेस, शान्तिवन-30750 
लिए छपवाया । सह-सम्पादिका ब्र.कु, उर्मिला 
(ए॥. ]९०. (02974)- 22825, 22826 


।, शान्तिवन 
(५ थ(6)५9॥],९00॥॥ 


























न 2 


. कलायत- हरियाणा के मुख्यमन्त्री चौ. ओमप्रकाश चौटाला को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. रेखा बहन। 2. अचंलपुर कैम्प- महाराष्ट्र की सार्वजनिक 
बांधकाम विभाग मन्त्री बहन वसुधा ताई देशमुख को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. पुष्पा बहन। 3. राजनांदगाँव- छत्तीसगढ़ के वाणिज्य, उद्योग एवं परिवहन मन्त्र 
भ्राता राजेन्द्र पाल सिंह भाटिया को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. पुष्पा बहन। 4. महाड़- महाराष्ट्र के ऊर्जा मन्त्री भ्राता अनन्त गीते के साथ ईश्वरीय ज्ञान-चर्चा के 
बाद ब्र.कु. छाया बहन तथा अन्य समूह चित्र में। 5. इटावा (जसवन्त नगर)- उत्तर प्रदेश के कृषि मन्त्री भ्राता शिवपाल यादव को ईश्वरीय साहित्य देती हुई ब्र.कु. 
मंजुला बहन। 6, पोरसा- मध्य प्रदेश के केबिनेट मन्त्री भ्राता नरेन्द्र सिंह तोमर को शॉल ओढ़ा कर सम्मानित करती हुई ब्र.कु. राधा बहन। 7. दसुआ- पंजाब के 
स्वास्थ्य मन्त्री भ्राता रमेश चन्द्र डोगरा को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. ज्ञानी बहन। 8. आनन्दपुर साहिब- पंजाब के यातायात राज्यमन््री डॉ, भ्राता रमेश दत्त 
को ईश्वरीय सन्देश देती हुई ब्र.कु. रीमा बहन। 9. बावल- हरियाणा के स्वास्थ्य मन््री डॉ. भ्राता एम.एल. रंगा का स्वागत करती हुई ब्र.कु. आशा बहन। 
0, रोपड़- पंजाब के सहकारिता, शिकायत निवारण एवं यातायात विभाग के राज्यमन्त्री डॉ. भ्राता रमेश दत्त शर्मा को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. प्रेम बहन। 
[।, कडेगाँव (सांगली)- महाराष्ट्र के अर्थमन््री भ्राता जयंतराव पाटिल को ईश्वरीय सौगात देती हुई ब्र.कु. मीना बहन। 2 . बरगढ़- उड़ीसा के एक्साइज मन्नी भ्राता 
आनन्द आचार्य, आध्यात्मिक झाँकी का उद्घाटन करते हुए। ब्र.कु. पार्वती बहन तथा ब्र.कु. बिनी बहन भी साथ में हैं। 


#॥६८६०७. (५७०, 40903/093, 709798॥ ।९९7९७.५४०. 
7२७/४७२/25/2/2003-2005, 7050९0 ॥( 
9॥94॥[9५9-30750 (#७90 ॥२०५0) 0॥ 

5-70 06 ॥6 ॥0ात 


चेननई- धार्मिक सद्भावना कार्यक्रम का उद्घाटन 
करते हुए गौडिया मठ के स्वामी बी .वी. मधुसुदन 
महाराज, इस्कान के स्वामी रविदास, तिरुवाडुथुरई 
अधिनाम अरुलथिरु मुथुकुमारस्वामी थाम्बिरन 
स्वामीगल, मुख्य काजी भ्राता मुफ्ती सालाहुद्दीन 
मोहम्मद अयूब, ब्र.कु. शिवकन्या बहन, चर्च 
के फ़ादर एस. सामसन, गुरु नानक सत्संग सभा 
के भ्राता रछपाल सिंह तथा अन्य। 

























आबू पर्वत (पाण्डब भवन)- 
भुबनेश्वर के राज्यपाल महामहिम 
भ्राता एम.एम, राजेन्द्रन तथा बहन 
सुशीला राजेन्द्रन, राजयोगिनी दादी 
रत्नमोहिनी जी, ब्र.कु. मृत्युन्जय भाई 
तथा अन्य अन्तर्राष्ट्रीय आध्यात्मिक 
सशक्तिकरण सम्मेलन का उद्घाटन 
करते हुए। 






गंगटोक- सिक्किम के राज्यपाल 
महामहिम भ्राता वी. रामाराव तथा 
शिक्षा प्रभाग की सचिव बहन जयश्री 
प्रधान ईश्वरीय साहित्य का 
अवलोकन करते हुए। 


२. 


हु मुम्बई (मालाड) - अन्तर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर 50 वेश्याओं को ईश्वरीय सन्देश देती हुई ब्र.कु, कुन्ती बहन। 
अर्पित, | मंच पर डॉ. भ्राता प्रशान्त दुबे तथा ब्र.कु. नीरा बहन भी उपस्थित हैं।